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**जीवन परिचय**
गयाप्रसाद शुक्ल 'सनेही' (1883–1972) हिंदी साहित्य के राष्ट्रीय चेतना के प्रमुख कवि थे। उत्तर प्रदेश के उन्नाव जनपद में उनका जन्म हुआ। उन्होंने अपने साहित्यिक जीवन की शुरुआत ब्रजभाषा में काव्य रचना करते हुई की, किंतु बाद में वे खड़ी बोली के श्रेष्ठ कवियों में अपना स्थान बना लिए।
**उपनाम का कारण**
शुक्ल जी ने स्वयं बताया कि सरकारी नौकरी के कारण उन्हें 'सनेही' के अलावा 'त्रिशूल' नाम भी रखना पड़ा। यह उनकी सरकारी पहचान थी।
**साहित्य का विषय**
शुक्ल जी के काव्य में मुख्य विषय थे —
• राष्ट्र-प्रेम और देश की स्वतंत्रता
• किसानों की दयनीय दशा
• मजदूरों के संघर्ष और शोषण
• सामाजिक कुरीतियों का विरोध
• जन जागरण और सामाजिक सुधार
**प्रमुख रचनाएँ**
शुक्ल जी की उल्लेखनीय रचनाएँ हैं —
• त्रिशूल तरंग (काव्य संग्रह)
• राष्ट्रीय मंत्र (देश-प्रेम की काव्य रचना)
• कृषक क्रंदन (किसानों की पीड़ा पर आधारित)
• स्वदेश (यह कविता)
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**कविता का शीर्षक: स्वदेश**
'स्वदेश' शीर्षक से ही पता चलता है कि यह कविता अपने देश के प्रति प्रेम, आसक्ति और कर्तव्यबोध पर केंद्रित है। यह कविता एक **आह्वान गीत** है जो पाठकों को देश-प्रेम के लिए प्रेरित करती है।
**मुख्य भाव और संदेश**
इस कविता का केंद्रीय संदेश यह है कि —
• जिसके हृदय में अपने देश के प्रति प्रेम नहीं है, वह हृदय पत्थर के समान है
• जीवन में साहस, उत्साह और संकल्प होना चाहिए
• सामूहिक रूप से आगे बढ़ने की भावना आवश्यक है
• अपने देश की मिट्टी, संस्कृति और ज्ञान-संपदा पर गर्व करना चाहिए
• देश की प्रगति के लिए प्रत्येक व्यक्ति का योगदान महत्वपूर्ण है
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**"वह हृदय नहीं है पत्थर है,
जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।"**
**अर्थ:** जिस व्यक्ति के हृदय में अपने देश के प्रति प्रेम नहीं है, उसका हृदय पत्थर के समान निर्जीव और संवेदनहीन है।
**व्याख्या:** यहाँ कवि ने 'हृदय' और 'पत्थर' की तुलना की है। पत्थर प्रतीकात्मक रूप से कठोरता, संवेदनहीनता और निर्जीवता का प्रतीक है। जो व्यक्ति अपने देश से प्रेम नहीं करता, उसमें मानवीय संवेदनाएँ नहीं होतीं। यह पंक्ति एक **विरोधाभास अलंकार** का उदाहरण है क्योंकि हृदय तो ऊतकों का बना है, किंतु उसे पत्थर कहा गया है।
**शब्दार्थ:**
• हृदय = मन, दिल
• पत्थर = निर्जीव, कठोर वस्तु
• स्वदेश = अपना देश
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**"जो जीवित जोश जगा न सका,
उस जीवन में कुछ सार नहीं।"**
**अर्थ:** जो व्यक्ति अपने जीवन में और दूसरों में उत्साह और जीवन्तता लाने में असमर्थ है, उसके जीवन का कोई महत्व या अर्थ नहीं होता।
**व्याख्या:** जीवन केवल शारीरिक अस्तित्व नहीं है, बल्कि इसमें उद्देश्य, उत्साह और सामाजिक योगदान होना चाहिए। जो व्यक्ति निष्क्रिय और निरुत्साह रहता है, वह पत्थर के समान है।
**शब्दार्थ:**
• जीवित जोश = जीवंत उत्साह
• सार = महत्व, मूल्य
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**"जो चल न सका संसार-संग,
उसका होता संसार नहीं।"**
**अर्थ:** जो व्यक्ति समाज के साथ तालमेल नहीं रखता और सामूहिक प्रयासों में भाग नहीं लेता, उसके लिए समाज और संसार का कोई अस्तित्व नहीं रहता।
**व्याख्या:** 'संसार-संग चलना' का अर्थ है — समाज की प्रगति में भागीदारी, सामूहिक कार्यों में योगदान, और सामाजिक दायित्वों का पालन करना। जो व्यक्ति अकेला रहता है और समाज से विमुख रहता है, उसे संसार की भी कोई परवाह नहीं रहती। यह एक सामाजिक सत्य को प्रकट करता है।
**शब्दार्थ:**
• संसार-संग = समाज के साथ, सामूहिकता के साथ
• होता = होता है (वर्तमान काल)
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**"जिसने साहस को छोड़ दिया,
वह पहुँच सकेगा पार नहीं।"**
**अर्थ:** जो व्यक्ति अपना साहस छोड़ देता है, वह कभी भी अपने लक्ष्य तक नहीं पहुँच सकता।
**व्याख्या:** यहाँ 'पार' का अर्थ है — सफलता, लक्ष्य या किनारा। कवि कहते हैं कि साहस के बिना कोई भी महान कार्य संभव नहीं। यह पंक्ति विशेष रूप से युवाओं को निर्भय और साहसी बनने के लिए प्रेरित करती है।
**शब्दार्थ:**
• साहस = हिम्मत,담्म
• पार = सफलता, लक्ष्य
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**"जिससे न जाति-उद्धार हुआ,
होगा उसका उद्धार नहीं।"**
**अर्थ:** जो व्यक्ति अपनी समाज (जाति/समुदाय) के उत्थान में योगदान नहीं देता, उसका व्यक्तिगत उद्धार भी संभव नहीं होता।
**व्याख्या:** यह पंक्ति एक सामाजिक विचार प्रस्तुत करती है कि व्यक्तिगत सुख और सफलता समाज की सामूहिक उन्नति से जुड़ी होती है। अगर आप समाज को आगे बढ़ाने में मदद नहीं करेंगे, तो आपकी खुद की मुक्ति और खुशहाली संभव नहीं होगी।
**शब्दार्थ:**
• जाति-उद्धार = समाज/समुदाय का उत्थान
• उद्धार = मुक्ति, कल्याण
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**"जिसकी मिट्टी में उगे बढ़े,
पाया जिसमें दाना-पानी।
हैं माता-पिता बंधु जिसमें,
हम हैं जिसके राजा-रानी।"**
**अर्थ:** जिस देश की मिट्टी में हम पले-बढ़े हैं, जहाँ हमें भोजन-जल मिला, जहाँ हमारे परिवार के सदस्य हैं, हम उसी देश के सर्वश्रेष्ठ राजा-रानी (मालिक) हैं।
**व्याख्या:** यह पंक्ति देश के प्रति कृतज्ञता और अधिकार दोनों को व्यक्त करती है। कवि कहते हैं कि देश हमारी जन्मभूमि है, पोषक भूमि है, और हम सभी इसके समान अधिकारी हैं। 'राजा-रानी' का अर्थ है कि हमें उसे संभालने और उन्नत करने की जिम्मेदारी है।
**शब्दार्थ:**
• मिट्टी = जन्मभूमि, माटी
• दाना-पानी = अनाज और पानी (जीवन आवश्यकताएँ)
• राजा-रानी = शासक, प्रभु, स्वामी (यहाँ प्रतीकात्मक)
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**"जिसने की खजाने खोले हैं,
नव रत्न दिये हैं लासानी।"**
**अर्थ:** हमारे देश ने अपने ज्ञान, संस्कृति, विज्ञान और विद्या के भंडार खोल दिए हैं और अनमोल रत्न प्रदान किए हैं।
**व्याख्या:** यहाँ 'खजाने' का अर्थ है — ज्ञान की संपदा, सांस्कृतिक धरोहर, वैज्ञानिक विकास। भारतीय ज्ञान और संस्कृति विश्व के लिए अमूल्य रहे हैं। वेद, उपनिषद, गणित, खगोल विज्ञान — सब कुछ भारत ने विश्व को दिया है।
**शब्दार्थ:**
• खजाने = भंडार, संपत्ति
• नव रत्न = नए, अनमोल रत्न (प्रतीकात्मक)
• लासानी = अलंकार (एक प्रकार की सजावट)
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**"जिस पर ज्ञानी भी मरते हैं,
जिस पर है दुनिया दीवानी।"**
**अर्थ:** जिस देश के लिए महान ज्ञानी भी जीवन समर्पित कर देते हैं, जिसके लिए पूरी दुनिया मुग्ध है।
**व्याख्या:** भारत में ऋषि, मुनि, विद्वान और महापुरुष अपना जीवन देश की सेवा में लगा देते थे। यह पंक्ति भारत की आध्यात्मिक और बौद्धिक श्रेष्ठता को दर्शाती है।
**शब्दार्थ:**
• मरते हैं = समर्पित होते हैं, जीवन देते हैं
• दीवानी = पागल, मुग्ध
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**"उस पर है नहीं पसीजा जो,
क्या है वह भू का भार नहीं।"**
**अर्थ:** जो व्यक्ति ऐसे महान देश के प्रति भावनात्मक नहीं हो पाता, उसका अस्तित्व पृथ्वी के लिए बोझ मात्र है।
**व्याख्या:** 'पसीजना' का अर्थ है गलना, भावुक होना, द्रवित होना। कवि कहते हैं कि जो व्यक्ति ऐसे महान देश के प्रति अपने दिल को नहीं पिघला सकता, उसके जीने का कोई महत्व नहीं है।
**शब्दार्थ:**
• पसीजा = पिघला, भावुक हुआ
• भू = पृथ्वी, धरा
• भार = बोझ, दायित्व
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**"निश्चित है निःसंशय निश्चित,
है जान एक दिन जाने को।
है काल-दीप जलता हरदम,
जल जाना है परवानों को।"**
**अर्थ:** यह निश्चित है कि सभी को एक दिन मृत्यु का सामना करना होगा। समय का दीप निरंतर जलता है, और परिंदों (आत्माओं) को उसमें जल जाना है।
**व्याख्या:** यह एक गहरा दार्शनिक संदेश है। कवि कहते हैं कि मृत्यु सभी के लिए निश्चित है। तो जब मरना ही है, तो अपने देश के लिए जीवन क्यों न समर्पित कर दिया जाए? यह प्रेरणा देता है कि समय की कीमत समझकर देशहित में काम करें।
**शब्दार्थ:**
• निश्चित = पक्का, नियत
• निःसंशय = संदेह रहित
• काल-दीप = समय की मशाल
• परवाने = तितलियाँ (यहाँ मानव आत्माओं के लिए प्रतीक)
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**"जो भरा नहीं है भावों से,
बहती जिसमें रस-धार नहीं।
वह हृदय नहीं है पत्थर है,
जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।"**
**अर्थ:** जिसका हृदय भावनाओं से भरा नहीं है, जिसमें रस (आनंद, संवेदना) की धारा नहीं बहती, वह हृदय पत्थर के समान है।
**व्याख्या:** यह पंक्ति पहली पंक्ति की पुनरावृत्ति है और इसे और विस्तार से समझाती है। भावनाएँ और संवेदनाएँ ही मनुष्य को मनुष्य बनाती हैं। जिसमें यह नहीं है, वह निर्जीव पत्थर है। देश-प्रेम भी एक भावना है, जो हृदय में होनी चाहिए।
**शब्दार्थ:**
• भावों = आवेग, संवेदनाओं
• रस-धार = प्रेम की बहती धारा
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**"सब कुछ है अपने हाथों में,
क्या तोप नहीं तलवार नहीं।"**
**अर्थ:** हमारे पास सभी साधन हैं — चाहे वह तोप हो या तलवार (युद्ध के साधन)। कुछ भी कमी नहीं है।
**व्याख्या:** यह पंक्ति एक प्रतीकात्मक अर्थ रखती है। यद्यपि इसमें शारीरिक हथियारों का जिक्र है, लेकिन इसका मुख्य अर्थ है कि हमारे पास सभी आवश्यक संसाधन, शक्तियाँ और क्षमताएँ हैं। हमें विकास करने के लिए किसी की राह नहीं देखनी चाहिए। हमें अपनी क्षमताओं पर विश्वास रखना चाहिए और आत्मनिर्भर बनना चाहिए।
**शब्दार्थ:**
• हाथों में = अधिकार में, नियंत्रण में
• तोप = बड़ी तोपची, हथियार
• तलवार = तलवार, हथियार
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**छंद का परिचय**
इस कविता में **सवैया छंद** का प्रयोग किया गया है, जो हिंदी काव्य का एक प्रमुख छंद है। सवैया छंद में चार चरण (पंक्तियाँ) होते हैं, और प्रत्येक चरण में 22-26 मात्राएँ होती हैं।
**लय और संगीतात्मकता**
कविता में निम्नलिखित विशेषताएँ देखी जा सकती हैं —
• प्रत्येक पंक्ति का अंत समानार्थी या समकक्ष शब्दों से होता है (जैसे — पत्थर-सार, संग-नहीं, दिया-लासानी, हैं-दीवानी)
• पंक्तियों के अंत में **तुक मिलान** है (जैसे — पत्थर-सार, जगा-सार, संग-नहीं)
• पुनरावृत्ति से नाटकीयता आई है (जैसे — पहली पंक्ति और अंतिम पंक्ति)
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**1. रूपक अलंकार**
पंक्ति: "वह हृदय नहीं है पत्थर है"
यहाँ हृदय और पत्थर में सीधी तुलना की गई है। यह **उपमा अलंकार** के बजाय **रूपक अलंकार** है क्योंकि एक को दूसरे के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
**2. अनुप्रास अलंकार**
पंक्ति: "बहती जिसमें रस-धार"
यहाँ 'ब' की पुनरावृत्ति है — "बहती...जिसमें"। यह **अनुप्रास अलंकार** है।
अतिरिक्त उदाहरण: "जिसकी मिट्टी में उगे बढ़े" — 'ज' की पुनरावृत्ति
**3. विरोधाभास (विरोधी) अलंकार**
पंक्ति: "वह हृदय नहीं है पत्थर है"
यहाँ हृदय (जीवंत) को पत्थर (निर्जीव) कहा गया है। यह विरोधाभास अलंकार है।
**4. मानवीकरण अलंकार**
पंक्ति: "है काल-दीप जलता हरदम"
समय को दीप (दीये) के रूप में चित्रित किया गया है, जो जल रहा है। यह मानवीय क्रिया को अमानवीय वस्तु पर लागू करना है।
**5. पुनरावृत्ति प्रकाश अलंकार**
पंक्ति: "निश्चित है निःसंशय निश्चित"
एक ही शब्द 'निश्चित' की दोहरी पुनरावृत्ति से बल और जोर आया है।
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**समास के उदाहरण**
1. **स्वदेश** = स्व + देश (तत्पुरुष समास) — अपना देश
2. **पृथ्वी** = पृथ = प्रथम, वी = भूमि (बहुव्रीहि) — पहली भूमि
3. **जाति-उद्धार** = जाति का उद्धार (तत्पुरुष समास)
4. **संसार-संग** = संसार के साथ (तत्पुरुष समास)
5. **काल-दीप** = काल का दीप (तत्पुरुष समास)
6. **राजा-रानी** = राजा और रानी (द्वंद्व समास)
**संधि के उदाहरण**
1. **उद्धार** = उत् + धार (विसर्ग संधि)
2. **निःसंशय** = निः + संशय (विसर्ग संधि)
3. **परवाने** = पर + वाने (विसर्ग संधि)
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कविता में कारकों का सुंदर प्रयोग किया गया है —
**1. कर्ता कारक**
"जिसने साहस को छोड़ दिया" — यहाँ 'जिसने' कर्ता है
**2. कर्म कारक**
"स्वदेश का प्यार" — यहाँ स्वदेश का प्यार कर्म है
**3. करण कारक**
"मिट्टी में उगे बढ़े" — यहाँ मिट्टी करण है
**4. संबंध कारक**
"स्वदेश का प्यार", "हृदय के भाव" — ये संबंध कारक हैं
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कविता में निम्नलिखित मुहावरे और लोकोक्तियाँ हैं —
**1. "पत्थर दिल होना" (मुहावरा)**
अर्थ: निर्दय, कठोर, संवेदनहीन होना
**2. "हाथों में सब कुछ है" (मुहावरा)**
अर्थ: सभी साधन और क्षमताएँ हैं
**3. "साहस छोड़ना" (मुहावरा)**
अर्थ: हिम्मत हार जाना, निराश हो जाना
**4. "संसार-संग चलना" (लोकोक्ति)**
अर्थ: समाज के साथ तालमेल रखना, सामूहिक भावना से काम करना
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**देश-प्रेम (राष्ट्र-प्रेम)**
यह कविता का केंद्रीय विषय है। कवि ने साफ़ शब्दों में कहा है कि —
• देश-प्रेम एक आवश्यक भावना है
• यदि किसी में यह भावना नहीं है, तो वह व्यक्ति निर्जीव और निरर्थक है
• देश के लिए जीवन समर्पित करना महान कर्तव्य है
**उप-विषय**
1. **साहस और संकल्प** — बिना साहस के कोई लक्ष्य प्राप्त नहीं हो सकता
2. **सामूहिकता** — व्यक्ति को समाज के साथ रहना चाहिए
3. **आत्मनिर्भरता** — हमारे पास सभी साधन हैं
4. **भावनात्मकता** — हृदय भावनाओं से भरा होना चाहिए
5. **त्याग और समर्पण** — महान व्यक्ति अपना जीवन समर्पित करते हैं
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**प्रश्न 1: "वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।" पंक्ति का अर्थ क्या है?**
**उत्तर:** इस पंक्ति में कवि कहते हैं कि जिस व्यक्ति के मन में अपने देश के प्रति प्रेम और भावना नहीं है, वह वास्तव में मानव नहीं है, बल्कि पत्थर के समान है। पत्थर निर्जीव, कठोर और संवेदनहीन होता है। इसी प्रकार, जिसमें देश-प्रेम नहीं है, वह भी संवेदनाओं से रहित है। यह एक रूपक अलंकार का प्रयोग है।
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**प्रश्न 2: कवि के अनुसार किस हृदय को पत्थर माना गया है?**
**उत्तर:** कवि के अनुसार निम्नलिखित हृदय को पत्थर माना गया है —
• जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं है
• जो भावनाओं से खाली है
• जिसमें उत्साह और जोश नहीं है
• जो साहस से विहीन है
• जो समाज के लिए कुछ नहीं करता
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**प्रश्न 3: "हम हैं जिसके राजा-रानी" से क्या तात्पर्य है?**
**उत्तर:** इस पंक्ति का अर्थ है कि जिस देश की मिट्टी में हमने जन्म लिया, जहाँ हमें भोजन और पानी मि
Q1. गयाप्रसाद शुक्ल 'सनेही' के अन्य उपनाम का नाम क्या है?
Answer: A — कवि ने स्वयं कहा है कि सरकारी नौकरी के कारण उन्हें 'त्रिशूल' उपनाम रखना पड़ा।
Q2. स्वदेश कविता में पत्थर की तुलना किससे की गई है?
Answer: B — कवि कहते हैं कि जिसमें देश-प्रेम नहीं है, उसका हृदय पत्थर के समान संवेदनहीन है।
Q3. 'दाना-पानी' और 'राजा-रानी' में कौन-सी साहित्यिक विशेषता है?
Answer: B — ये दोनों शब्दों की अंतिम ध्वनि समान है, जिससे तुक मिलता है और कविता में लयात्मकता आती है।
Q4. योजक चिह्न का सही प्रयोग किस पंक्ति में है?
Answer: B — संसार-संग में योजक चिह्न का सही प्रयोग हुआ है, जो 'संसार के साथ' का भाव दर्शाता है।
Q5. कविता के अनुसार किसका जीवन निष्फल है?
Answer: B — कवि कहते हैं — 'जो जीवित जोश जगा न सका, उस जीवन में कुछ सार नहीं।'
Q6. 'संसार-संग' चलने से कवि का क्या अभिप्राय है?
Answer: B — कवि का भाव है कि व्यक्ति को सामाजिक दायित्व समझते हुए समाज और देश के विकास में योगदान देना चाहिए।
Q7. निम्नलिखित में से कौन-से शब्द 'भू' (पृथ्वी) के समानार्थी हैं?
Answer: B — धरा, पाषाण (पत्थर) और जग (संसार) — ये तीनों शब्द 'भू' (पृथ्वी/देश) के समानार्थी हैं।
Q8. 'जिसकी मिट्टी में उगे बढ़े' पंक्ति में 'उगे-बढ़े' किसके लिए प्रयुक्त हुए हैं?
Answer: C — कवि सामान्य अर्थ में कहते हैं कि हम सभी (मानव, जंतु, पौधे) इसी देश की मिट्टी में बढ़े हैं।
Q9. 'उस पर है नहीं पसीजा जो, क्या है वह भू का भार नहीं' — इससे कवि का क्या कहना है?
Answer: B — 'पसीजना' का अर्थ है पिघलना/संवेदनशील होना; यदि कोई देश के प्रति पिघलता नहीं है, तो वह देश के लिए बोझ है।
Q10. कविता में 'काल-दीप' का क्या प्रतीकात्मक अर्थ है?
Answer: C — काल-दीप प्रतीक है कि समय बीतता जा रहा है और मौत निश्चित है, इसलिए व्यक्ति को देश-सेवा में तत्पर रहना चाहिए।
स्वदेश कविता के कवि का नाम क्या है?
गयाप्रसाद शुक्ल 'सनेही' (1883-1972) हिंदी के राष्ट्र-प्रेम कवि हैं।
वह हृदय नहीं है पत्थर है — इस पंक्ति में पत्थर से क्या अर्थ है?
पत्थर से अभिप्राय संवेदनहीनता, कठोरता और भावनाओं की कमी से है।
स्वदेश कविता का मुख्य विषय क्या है?
कविता का मुख्य विषय देश के प्रति प्रेम, साहस और कर्तव्य-भाव को जगाना है।
हम हैं जिसके राजा-रानी — इस पंक्ति में 'हम' शब्द किसके लिए आया है?
यह शब्द देश के सभी नागरिकों के लिए प्रयुक्त हुआ है, न कि शासकों के लिए।
जो चल न सका संसार-संग — संसार-संग चलने का अर्थ क्या है?
संसार-संग चलने का अर्थ है सामाजिक दायित्व समझना और समाज के विकास में भाग लेना।
तुक मिलाना किसे कहते हैं?
तुक मिलाना अर्थात् पंक्तियों के अंतिम शब्दों की ध्वनि को समान रखना, जैसे दाना-पानी और राजा-रानी।
योजक चिह्न का प्रयोग कहाँ होता है?
योजक चिह्न (-) दो शब्दों को जोड़ने और उनके बीच परस्पर संबंध स्पष्ट करने के लिए प्रयोग होता है।
उस पर है नहीं पसीजा जो — इस पंक्ति का भाव क्या है?
इसका भाव है कि जो व्यक्ति देश के प्रति संवेदनशील नहीं है, वह देश के लिए बोझ है।
कविता में कवि किन्हें अपील करते हैं?
कवि उन सभी को अपील करते हैं जिनमें साहस है, जिनके पास जोश है और जो देश-सेवा के लिए तत्पर हैं।
खादी गीत किसके द्वारा लिखी गई है?
खादी गीत सोहनलाल द्विवेदी द्वारा लिखी गई है, जो स्वतंत्रता आंदोलन के समय की रचना है।
'स्वदेश' कविता का मुख्य संदेश एक वाक्य में लिखिए। [1 mark]
कविता का केंद्रीय विचार: देश-प्रेम, साहस, और कर्तव्य-भाव को जगाना।
'वह हृदय नहीं है पत्थर है' पंक्ति का आशय समझाइए। [2 marks]
पत्थर = संवेदनहीनता, कठोरता। जिसमें देश-प्रेम नहीं है, वह व्यक्ति भावनाएँ नहीं रखता।
कविता में कवि ने किन-किन बातों से देश की महत्ता को दर्शाया है? तीन उदाहरण दीजिए। [3 marks]
देश की मिट्टी (पोषण), ज्ञान-संपदा (दुनिया दीवानी), परिवार (माता-पिता-बंधु), हमारी जिम्मेदारी (राजा-रानी)।
'संसार-संग' चलने का अर्थ क्या है? कविता के संदर्भ में समझाते हुए यह बताइए कि एक विद्यार्थी संसार-संग कैसे चल सकता है। [5 marks]
संसार-संग = समाज के साथ, सामाजिक जिम्मेदारी। विद्यार्थी: शिक्षा से समाज की सेवा, मानवीय मूल्यों को अपनाना, देश के विकास में योगदान। उदाहरण: गाँव को पढ़ाना, परिवेश को स्वच्छ रखना, राष्ट्रभावना से काम करना।
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