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Pahalwan Ki Dholak

NCERT Class 12 · Hindi Based on NCERT Class 12 Hindi textbook · Free CBSE study kit

Chapter Notes

पहलवान की ढोलक — फणीश्वर नाथ रेणु

व्यापक अध्ययन नोट्स (CBSE Class 12)

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लेखक परिचय

**फणीश्वर नाथ रेणु (1921-1977)**

**जन्म:** 4 मार्च 1921, औराही हिंगना (अब अरेरिया), बिहार

**प्रमुख रचनाएँ:**

  • **उपन्यास:** मैला आँचल, परती परिकथा, दीर्घतपा, जुलूस, कितने चौराहे
  • **कहानी संग्रह:** ठुमरी, अग्निखोर, आदिम रात्रि की महक, एक श्रावणी दोपहरी की धूप
  • **संस्मरण:** ऋणजल धनजल, वनतुलसी की गंध, श्रुत-अश्रुत पूर्व
  • **रिपोर्ताज:** नेपाली क्रांति कथा
  • **सम्पूर्ण रचनाएँ:** रेणु रचनावली (पाँच खंडों में)
  • **निधन:** 11 अप्रैल 1977, पटना

    **साहित्यिक महत्व:** रेणु आंचलिक उपन्यासकार के रूप में हिंदी साहित्य में प्रतिष्ठित हैं। उनके जीवन में राजनीतिक और सामाजिक आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी थी, जो उनके सृजनात्मक साहित्य को नई दिशा प्रदान करती रही।

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    पहलवान की ढोलक: प्रस्तावना

    **कहानी का केंद्रीय विचार:**

    यह कहानी ऐसे पात्रों की है जो जन्मप्रस्तिष्ठा पाते ही अपने सिरजनहार के बँधे-बँधाए नियम, कानून, नीति या फॉर्मूले को तोड़कर बाहर निकल आते हैं और अपने जीवन को अपने मन के मुताबिक गढ़ने लगते हैं।

    **रेणु की आंचलिकता:**

    **आंचलिक शब्द का अर्थ:** किसी खास क्षेत्र की भाषा, संस्कृति, लोकजीवन और लोक-परंपरा को केंद्र में रखकर साहित्य रचना करना।

    **रेणु की विशेषता:**

  • लोकगीत, लोकोक्ति, लोकसंस्कृति, लोकभाषा और लोकनायक की संकल्पना को साहित्य में प्रतिष्ठा दी
  • गाँव के मानवीय जीवन को यथार्थ रूप में चित्रित किया
  • ढोलक और पहलवान को ही नायक बनाया, न कि किसी भारी-भरकम नायक को
  • अंचल को कच्चे और अनगढ़ रूप में प्रस्तुत किया
  • अंचल का चित्र एक ओर तो शल्य-शक्य (दुर्भेद्य) है, तो दूसरी ओर धूलभरा और मैला है
  • **स्वतंत्र्योत्तर भारत में रेणु का योगदान:**

    जब सारा विकास शहर-केंद्रित हो रहा था, तब रेणु ने अपनी रचनाओं से अंचल की समस्याओं की ओर लोगों का ध्यान खींचा। इससे यह विचार भी पुष्ट होता है कि भाषा की सार्थकता बोली के सहचर्य में ही है।

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    पहलवान की ढोलक: कथानक सारांश

    **कहानी का परिचय:**

    यह कहानी फणीश्वर नाथ रेणु की प्रतिनिधि कहानी है जो लोकजीवन, लोककला और उसके विलुप्त होते स्वरूप को चित्रित करती है। कहानी का मूल विषय यह है कि कैसे परिवर्तनशील सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था लोककला और लोककलाकारों को अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करने के लिए विवश कर देती है।

    **प्रमुख पात्र:**

    1. **लुत्फन सिंह (लुत्फु):** एक पहलवान जो ढोलक की आवाज़ पर दाँव-पेंच प्रदर्शित करता है

    2. **ढोलक:** यह एक संगीत वाद्य है जो कहानी के शीर्षक में है और जिसकी आवाज़ पहलवान के कार्य को नियंत्रित करती है

    3. **चाँद सिंह (शेर के बच्चे):** एक विख्यात पहलवान जो पंजाब से आता है

    4. **राजा साहब:** शहर का स्थानीय शासक जो ढोलक और पहलवान का संरक्षक है

    5. **ढोलक का मालिक/बाजे वाले:** जो ढोलक को संचालित करते हैं

    6. **गाँव के लोग:** जो महामारी से पीड़ित हैं

    **कहानी का विस्तारपूर्ण वर्णन:**

    **पहला चरण: लुत्फु का आरंभिक जीवन**

    गाँव में जाड़े का समय है, अमावस्या की रात, ठंडी और काली। गाँव मलेरिया और हैजे से पीड़ित है। बूढ़ी और उजड़ी बाँस-फूस की झोंपड़ियों में अंधकार और सन्नाटा है। लुत्फु के माता-पिता उसे नौ वर्ष की उम्र में ही अनाथ बना गए थे। सौभाग्यवश उसका विवाह हो चुका था, नहीं तो वह भी अपने माता-पिता का अनुसरण करता।

    **लुत्फु के गठनकाल की घटनाएँ:**

  • विधवा सास ने उसे पालन-पोषण किया
  • बचपन में वह गाय चराता था, धरोष्णी दूध पीता था और कसरत करता था
  • गाँव के लोग उसकी सास को तरह-तरह की तकलीफें देते थे
  • लुत्फु के सिर पर कसरत की धुन सवार हुई, जिससे उसने अपने सीने और बाँहों को सुडौल और मांसल बना लिया
  • किशोरावस्था में ही वह गाँव का सबसे अच्छा पहलवान समझा जाने लगा
  • **दंगल और शेर के बच्चे का आगमन:**

    एक बार लुत्फु ²दंगल² देखने शेमनगर मेला गया। वहाँ पहलवानों की कुश्ती और दाँव-पेंच देखकर उसे तरंग महसूस हुई। युवावस्था की मस्ती और ढोलक की लहकारी आवाज़ ने उसकी नसों में बिजली उत्पन्न कर दी। उसने बिना सोचे-समझे दंगल में ²शेर के बच्चे² को चुनौती दे दी।

    **शेर के बच्चे का परिचय:**

    शेर के बच्चे का असल नाम **चाँद सिंह** था। वह अपने गुरु पहलवान बांदी सिंह के साथ पंजाब से पहली बार शेमनगर मेले में आया था। बेहद सुंदर जवान, अंग-प्रत्यंग से सुंदरता टपकती थी। तीन दिनों में ही पंजाबी और पठान पहलवानों के गिरोह के अपनी जोड़ी और उम्र के सभी पहलवानों को पछाड़कर उसने ²शेर के बच्चे² की टाइटल प्राप्त कर ली। इसलिए वह दंगल के मैदान में लंगोट लगाकर एक अजीब किलकारी भरकर छोटी दुकची लगाया करता था। देशी नौजवान पहलवान उससे लड़ने की कल्पना से ही घबराते थे।

    **पहली कुश्ती:**

    शेमनगर के दंगल में लुत्फु की चुनौती सुनकर राजा साहब चकित हो गए, फिर बाश की तरह चाँद सिंह पर टूट पड़े। शांत दर्शकों की भीड़ में खलबली मच गई: **"पागल है पागल, मरा-एसे! मरा-मरा!"**

    पर वाह रे बहादुर! लुत्फु बड़ी सफाई से आक्रमण को सँभालकर निकल आया और पैंतरा दिखाने लगा। राजा साहब ने कुश्ती बंद करवाकर लुत्फु को अपने पास बुलाया और समझाया। अंत में उसकी हिम्मत की प्रशंसा करते हुए दस रुपये का नोट देकर कहा: **"जाओ, मेला देखकर घर जाओ!"**

    लेकिन लुत्फु की प्रतिक्रिया राजा साहब को हतप्रभ कर गई:

    **"नहीं सरकार, लड़ेंगे--- हुकूमे हो सरकार---!"**

    राजा साहब ने कहा: **"तुम पागल हो, जाओ!"**

    मेजर साहब से लेकर सिपाहियों तक ने धमकाया। सभी को लगा कि लुत्फु के शरीर में गोश्त नहीं है। पर लुत्फु: **"दुहाई सरकार, पत्थर पर माथा पटककर मर जाऊँगा--- मिले हुकूमे!"**

    वह हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाता रहा।

    **कुश्ती का द्वितीय चरण:**

    भीड़ अधीर हो गई। बाजे बंद हो गए। पंजाबी पहलवानों की भीड़ क्रोध से पागल होकर लुत्फु पर गालियों की बौछार कर रही थी। कोई-कोई लुत्फु के पक्ष से चिल्ला उठता था: **"उसे लड़ने दिया जाए!"**

    राजा साहब विवश हो गए और आज्ञा दे दी: **"लड़ने दो!"**

    बाजे बजने लगे। दर्शकों में फिर उत्तेजना पैदा हुई। मेले के दुकानदार दुकान बंद करके दौड़े: **"चाँद सिंह की जोड़ी-चाँद की कुश्ती हो रही है!!"**

    **कुश्ती का विवरण:**

    ^pV~&èkk] fxM+&èkk, pV~&èkk, fxM+&èkk---^

    (आ जा भिड़ जा, आ जा भिड़ जा!)

    भरी आवाज़ में एक ढोलक बोलने लगी:

    ^<kd~&<Muk] <ko~Q&<Muk, <ko~Q&<Muk---^

    (वाह पहलवान! वाह पहलवान!!)

    लुत्फु को चाँद ने दबा लिया। दर्शकों ने ताली बजाई: **"अरे गया-गया!!"**

    लेकिन लुत्फु की आँखें बाहर निकल जाने लगीं। उसकी छाती फटने-फटने को हो गई। जनता सब चाँद के पक्ष में थी। राजमत, बहुमत चाँद के पक्ष में था। लुत्फु के पक्ष में केवल ढोलक की आवाज़ थी, जिसकी तालपर वह अपनी शक्ति और दाँव-पेंच की परीक्षा ले रहा था--- अपनी हिम्मत को बढ़ा रहा था।

    **अचानक एक पतली आवाज़ सुनाई दी:**

    ^èkkd&fèkuk] frjdV&fruk] èkkd&fèkuk, frjdV&fruk---!!^

    (दाँव काटो, बाहर हो जा दाँव काटो, बाहर हो जा!!)

    लोगों के आश्चर्य की सीमा नहीं रही। लुत्फु ने दाँव काटकर बाहर निकल गया। फिर दौड़कर उसने चाँद की गर्दन पकड़ ली।

    **"वाह रे मिट्टी के शेर!"**

    **"अच्छा! बाहर निकल आया? इसीलिए तो-----!"**

    जनता बदल गई। जीत का ख़ेल बदल रहा था।

    **ढोलक की अगली आवाज़:**

    ^pVkd~&pV~&èkk] pVkd~&pV~&èkk---^

    (उठा पटक दे! उठा पटक दे!!)

    लुत्फु ने चालाकी से दाँव और जोर लगाकर चाँद को जमीन पर दे मारा।

    ^fèkuk&fèkuk] fèkd&fèkuk!^

    (अर्थात् चित कर जा! चित कर जा!!)

    लुत्फु ने अंतिम जोर लगाया--- चाँद सिंह चारों खाने चित हो गया।

    **"धा-गिड़-गिड़, धा-गिड़-गिड़, धा-गिड़-गिड़!"**

    (वाह बहादुर! वाह बहादुर!! वाह बहादुर!!)

    जनता यह निर्णय नहीं कर सकी कि किसकी जय-धवनि की जाए। फलत: अपनी-अपनी इच्छानुसार किसी ने **"माँ दुर्गा की"**, **"महावीर जी की"**, कुछ ने राजा शेमनंद की जय-धवनि की। अंत में सम्मिलित **"जय!"** से आकाश गूँज उठा।

    **राजा साहब का सम्मान:**

    विजयी लुत्फु दौड़ता-पाँदता, तालबाज़ी करता, सबसे पहले बाजे वालों की ओर दौड़ा और ढोलकों को श्रद्धापूर्वक प्रणाम किया। फिर दौड़कर उसने राजा साहब को गोद में उठा लिया। राजा साहब के कीमती कपड़े मिट्टी में सन गए। मेजर साहब को आपत्ति हुई: **"हँस-हँस---अरे-रे!"**

    लेकिन राजा साहब ने स्वयं उसे छाती से लगाकर गद्गद होकर कहा: **"जीते रहो, बहादुर! तुमने मिट्टी की लाज रख ली!"**

    **नया पद और सम्मान:**

    पंजाबी पहलवानों की भीड़ चाँद सिंह की आँखें पोंछ रही थी। लुत्फु को राजा साहब ने न केवल पुरस्कृत किया, बल्कि अपने दरबार में सदा के लिए रख लिया। तब से लुत्फु राज-पहलवान हो गया और राजा साहब उसे **"लुत्फु सिंह"** कहकर पुकारने लगे।

    **लुत्फु की प्रसिद्धि:**

    उसी दिन से लुत्फु सिंह पहलवान की किर्ति दूर-दूर तक फैल गई। पौष्टिक भोजन और व्यायाम तथा राजा साहब की स्नेह-दृष्टि ने उसकी प्रसिद्धि में चार चाँद लगा दिए। कुछ वर्षों में ही उसने एक-एक करके सभी नामी पहलवानों को मैदान में संघाकर आसमान दिखा दिया।

    कृष्ण खाँ के संबंध में यह बात मशहूर थी कि वह ज्यों ही लंगोट लगाकर **"आ-ली"** कहकर अपने प्रतिद्वंद्वी पर टूटता है, प्रतिद्वंद्वी पहलवान को लकवा मार जाता है। लुत्फु ने उसको भी पटककर लोगों का भ्रम दूर कर दिया।

    **राज-दरबार में लुत्फु का जीवन:**

    उसके बाद से वह राज-दरबार का दर्शनीय **"जीव"** ही रहा। पक्षीखाने में चिड़ियों को झकझोरकर बाघ दहाड़ता: **"हाँ-उँ, हाँ-उँ!!"** सुनने वाले कहते: **"राजा का बाघ बोला।"**

    ठाकुरबाड़े के सामने पहलवान गर्जता: **"महा-वीर!"** लोग समझ लेते, पहलवान बोला।

    मेलों में वह घुटने तक लंबे चोगे में, अस्त-व्यस्त पगड़ी बाँधकर मटवाले हाथी की तरह झमता चलता। दुकानदारों को चुगल करने की सूझती। हलवाई अपनी दुकान पर बुलाता: **"पहलवान दाका! ताश्शा रसगुल्ला बना है, शरा नाश्ता कर लो!"**

    **लुत्फु की बाल-बुद्धि:**

    पहलवान बच्पों की-सी स्वाभाविक हँसी हँसकर कहता: **"अरे तनी-मनी काहे! ले आ ड़ेढ़ सेर!"**

    और बैठ जाता। दो सेर रसगुल्ले को उदरस्थ करके, मुँह में आठ-दस पान की गिलौरियाँ ठूँस, ठुकी को पान के रस से लाल करते हुए अपनी चाल से मेले में घूमता। मेले से दरबार लौटने के समय उसकी अजीब गुलिया रहती--- आँखों पर रँगीन अबरख का चश्मा, हाथ में खिलौने को नचाता और मुँह से पीतल की सीटी बजाता, हँसता हुआ वह वापस जाता।

    **बुद्धि की कमी की व्याख्या:**

    बल और शरीर की वृद्धि के साथ बुद्धि का परिणाम घटकर बच्पों की बुद्धि के बराबर ही रह गया था उसमें।

    **दरबार के दिनों की विलास-लीला:**

    दंगल में ढोलक की आवाज़ सुनते ही वह अपने भारी-भरकम शरीर का प्रदर्शन करना शुरू कर देता था। उसकी जोड़ी तो मिलती ही नहीं थी। यदि कोई उससे लड़ना भी चाहता तो राजा साहब लुत्फु को आज्ञा ही नहीं देते। इसलिए वह निराश होकर, लंगोट लगाकर देह में मिट्टी मल और उछालकर अपने को साँड़ या भैंस साबित करता रहता था। बूढ़े राजा साहब देखते हुए मुस्कुराते रहते थे।

    **पंद्रह वर्षों का गुजरना:**

    यों ही पंद्रह वर्ष बीत गए। पहलवान अजय रहा। वह दंगल में अपने दोनों पुत्रों को लेकर उतरता था। पहलवान की सास पहले ही मर चुकी थी। पहलवान की पत्नी भी दो पहलवानों को पैदा करके स्वर्ग सिधार गई थी। दोनों लड़के पिता की तरह ही गठीले और तगड़े थे। दंगल में दोनों को देखकर लोगों के मुँह से अनायास ही निकल पड़ता: **"वाह! बाप से भी बढ़कर निकलेंगे ये दोनों बेटे!"**

    **भविष्य की तैयारी:**

    दोनों ही लड़के राज-दरबार के भावी पहलवान घोषित हो चुके थे। अत: दोनों का भरण-पोषण दरबार से ही हो रहा था। प्रतिदिन प्रात:काल पहलवान स्वयं ढोलक बजा-बजाकर दोनों से कसरत करवाता। दोपहर में लेटे-लेटे दोनों को संसारिक ज्ञान की भी शिक्षा देता: **"समझे! ढोलक की आवाज़ पर पूरा ध्यान देना। हाँ, मेरा गुरु कोई पहलवान नहीं, यही ढोलक है, समझे! ढोलक की आवाज़ के प्रताप से ही मैं पहलवान हुआ। दंगल में उतरकर सबसे पहले ढोलकों को प्रणाम करना, समझे!"**

    इसके अलावा अपने पुत्रों को अन्य महत्वपूर्ण बातें भी सिखाता: **"फिर मालिक को कैसे खुश रखा जाता है, कब कैसा व्यवहार करना चाहिए"**, आदि की शिक्षा वह नित्य देता था। फिर मालिक को कैसे खुश रखा जाता है, कब कैसा व्यवहार करना चाहिए, आदि की शिक्षा वह नित्य देता था।

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    दूसरा भाग: परिवर्तन का समय

    **नए राजकुमार का आगमन:**

    लेकिन उसकी शिक्षा-दीक्षा, सब किए-कराए पर एक दिन पानी फिर गया। बूढ़े राजा स्वर्ग सिधार गए। नए राजकुमार ने विलायत से आते ही राज्य को अपने हाथ में ले लिया। राजा साहब के समय शिथिलता आ गई थी, राजकुमार के आते ही दूर हो गई। बहुत से परिवर्तन हुए। उन्हीं परिवर्तनों की चपेटाघात में पड़ा पहलवान भी।

    **पहलवान की बर्खास्तगी:**

    पहलवान तथा दोनों भावी पहलवानों का दैनिक भोजन-व्यय सुनते ही राजकुमार ने कहा: **"टेरिबुल!"**

    नए मेजर साहब ने कहा: **"हौरिबुल!"**

    पहलवान को सीधा जवाब मिल गया। राज-दरबार में उसकी आवश्यकता नहीं थी। उसको गिड़गिड़ाने का भी मौका नहीं दिया गया।

    **पहलवान का गाँव लौटना:**

    उसी दिन वह ढोलक कंधे से लटकाकर, अपने दोनों पुत्रों के साथ अपने गाँव में लौट आया। गाँव के एक कोने पर गाँववालों ने एक झोंपड़ी बाँध दी। वहीं रहकर वह गाँव के नौजवानों और चरवाहों को कुश्ती सिखाने लगा। खाने-पीने का खर्च गाँववालों की ओर से बँधा हुआ था।

    **पहलवान की भूमिका में परिवर्तन:**

    सुबह-शाम वह स्वयं ढोलक बजाकर अपने शिष्यों और पुत्रों को दाँव-पेंच सिखाया करता था। गाँव के किसान और खेतिहर-मजदूर के बच्चे भला क्या खाकर कुश्ती सीखते! धीरे-धीरे पहलवान का स्कूल खाली पड़ने लगा।

    **महामारी का आगमन:**

    अकस्मात गाँव पर यह वज्रपात हुआ। पहले अनावृष्टि, फिर अन्न की कमी, तब मलेरिया और हैजे ने मिलकर गाँव को भूनना शुरू कर दिया।

    **महामारी के समय की दयनीय स्थिति:**

    गाँव प्राय: सूना हो चला था। घर के घर खाली पड़ गए थे। रोश दो-तीन लाशें उठने लगी। लोगों में खलबली मची हुई थी। दिन में तो दलकव, हाहाकार त

    MCQs — 10 Questions with Answers

    Q1. फणीश्वर नाथ रेणु का प्रसिद्ध उपन्यास कौन सा है?

    • A. मैला आँचल ✓
    • B. गोदान
    • C. मुंशी प्रेमचंद की कृति
    • D. कमला मेहता का चित्रपट

    Answer: A — मैला आँचल (1954) रेणु का सबसे प्रसिद्ध आंचलिक उपन्यास है जिसने हिंदी साहित्य को नई दिशा दी।

    Q2. पहलवान की ढोलक में ढोलक की आवाज़ 'चट्-धा, गिड्-धा' क्या प्रतीकार्थ में दर्शाती है?

    • A. मृत गाँव में जीवन का संचार ✓
    • B. सिर्फ संगीत का आनंद
    • C. पहलवान की निपुणता
    • D. व्यायाम करने का समय

    Answer: A — ढोलक की ये आवाज़ें 'आ जा, भिड़ जा' का संदेश देती हैं और भूख-महामारी से पीड़ित गाँव को जीवंत रखती हैं।

    Q3. रेणु के साहित्य में 'अंचल' की अवधारणा का अर्थ क्या है?

    • A. शहरी सभ्यता का विकास
    • B. गाँव की भाषा, संस्कृति, लोकजीवन को केंद्र में रखना ✓
    • C. राजनीतिक सीमा निर्धारण
    • D. आधुनिक शिक्षा व्यवस्था

    Answer: B — अंचल-केंद्रित साहित्य में गाँव की लोकभाषा, लोकगीत, लोकसंस्कृति और लोकनायक को ही केंद्र में रखा जाता है।

    Q4. कहानी में लुन्ना पहलवान किन परिस्थितियों में भी अपनी ढोलक बजाता रहता है?

    • A. सिर्फ खुशी के समय में
    • B. भूख और महामारी से पीड़ित गाँव में भी ✓
    • C. मेले और त्योहारों में ही
    • D. राजा साहब की प्रशंसा के लिए

    Answer: B — लुन्ना भीषण भूख-महामारी के समय भी गाँव को मनोबल देने के लिए ढोलक बजाता रहता है, जो उसकी निष्ठा दर्शाता है।

    Q5. कहानी के अंत में पोल के पुरानी व्यवस्था से नई व्यवस्था में बदल जाने का क्या प्रतीकार्थ है?

    • A. केवल भौतिक परिवर्तन
    • B. सामंतवाद का विलोप और आधुनिकता का आगमन ✓
    • C. पहलवान की व्यक्तिगत असफलता
    • D. राजा साहब की दयालुता

    Answer: B — पोल का बदलना पुरानी सामंती व्यवस्था के स्थान पर आधुनिक शहरी व्यवस्था के प्रतिष्ठापन का प्रतीक है।

    Q6. निम्न में से कौन सा कथन 'पहलवान की ढोलक' के संदर्भ में गलत है? (Which is NOT correct?)

    • A. यह कहानी लोक-कला के विलोप की समस्या को दर्शाती है
    • B. लुन्ना एक समृद्ध जमींदार है ✓
    • C. अंचल-केंद्रित साहित्य गाँव की संस्कृति को जीवंत करता है
    • D. चाँद सिंह नई व्यवस्था का प्रतिनिधि है

    Answer: B — लुन्ना एक दलित पहलवान है, जमींदार नहीं। वह गाँव का सामान्य जन है जो लोक-कला के माध्यम से समाज को सेवा देता है।

    Q7. राजा साहब द्वारा लुन्ना को दस रुपये देते समय 'जाओ, मेला देख कर घर जाओ' कहना क्या दर्शाता है?

    • A. राजा साहब की उदारता
    • B. लुन्ना के लिए राजा साहब की सहानुभूति
    • C. पहलवानी को समाप्त मानते हुए लुन्ना को दर्शक बनाना (Assertion-style) ✓
    • D. मेले में भाग लेने का निमंत्रण

    Answer: C — यह संवाद पहलवानी कला को नई व्यवस्था में अप्रासंगिक मानते हुए लुन्ना को केवल दर्शक की भूमिका में रखने का संकेत देता है।

    Q8. रेणु की लेखन शैली की निम्नलिखित विशेषताओं में से कौन सी कहानी में सर्वाधिक प्रभावी है? (HOTS - Multi-concept)

    • A. शहरी जीवन का वर्णन
    • B. गाँव की भाषा, लोकगीत और संगीतात्मक गद्य का समन्वय ✓
    • C. राजनीतिक विचारधारा का प्रचार
    • D. वैज्ञानिक तथ्यों की व्याख्या

    Answer: B — रेणु ने 'पहलवान की ढोलक' में गाँव की भाषा, ढोलक की आवाज़, और गद्य में संगीत का अद्भुत समन्वय करके पात्रों को जीवंत बनाया है।

    Q9. कहानी में दो बार (पहले लुन्ना से, फिर चाँद सिंह से) मेले में कुश्ती की घटना दोहराई जाती है। इसका क्या अर्थ है?

    • A. समान घटनाओं की पुनरावृत्ति
    • B. पहलवानी की परंपरा का निरंतरता और फिर नई व्यवस्था द्वारा उसका स्थानांतरण (Two-statement) ✓
    • C. लेखक की कहानी दोहराने की आदत
    • D. राजा साहब के निर्णय में परिवर्तन

    Answer: B — लुन्ना की विजय और फिर चाँद सिंह की विजय सांस्कृतिक परिवर्तन को दर्शाते हैं - पुरानी कला का विलोप और नई व्यवस्था का प्रतिष्ठापन।

    Q10. यदि लुन्ना की ढोलक की आवाज़ को 'चट्-धा' (45 डिग्री गति) में व्यक्त किया जाए, तो इसका गति-संबंधी अर्थ क्या है?

    • A. आवाज़ की दिशा की गणना
    • B. निरंतर, अविरत गति जो गाँव के जीवन की लय को दर्शाती है ✓
    • C. संगीत की गणितीय माप
    • D. पहलवान की शारीरिक शक्ति का प्रमाण

    Answer: B — ढोलक की '45 डिग्री' गति लुन्ना की अविचल, निरंतर प्रतिबद्धता को दर्शाती है जो मृत गाँव में लय और जीवन लाती है।

    Flashcards

    फणीश्वर नाथ रेणु का जन्म कहाँ और कब हुआ?

    फणीश्वर नाथ रेणु का जन्म 4 मार्च 1921 को आरा (बिहार) के निकट शिला पूर्णिया में हुआ।

    'पहलवान की ढोलक' कहानी का मूल विषय क्या है?

    यह कहानी लोक-कला (पहलवानी) के विलोप और आर्थिक व्यवस्था के बदलाव के बीच मानवीय संघर्ष को दर्शाती है।

    लुन्ना पहलवान किस कारण गाँव के लिए महत्वपूर्ण था?

    लुन्ना पहलवान अपनी ढोलक की आवाज़ और पहलवानी कला से मृत गाँव को जीवंत रखता था और लोगों को भूख-महामारी से लड़ने की ताकत देता था।

    'अंचल' की अवधारणा रेणु के साहित्य में क्या दर्शाती है?

    अंचल की अवधारणा गाँव की भाषा, लोकसंस्कृति, लोकगीत, लोकोक्ति और लोकनायक को केंद्र में रखते हुए जीवंत समाज को दर्शाती है।

    पहलवान की ढोलक की गति क्या प्रतीकात्मक संदेश देती है?

    'चट्-धा, गिड्-धा... आ जा भिड़ जा' की गति लोक-कला की अविरत लड़ाई को प्रतीकार्थ में व्यक्त करती है।

    कहानी के अंत में 'पोल' का बदलाव क्या दर्शाता है?

    पोल का पुरानी व्यवस्था से नई सभ्य व्यवस्था में बदल जाना सामंतवाद के विलोप और आधुनिकता के आगमन को प्रतीकित करता है।

    रेणु की लेखन-शैली की विशेषता क्या है?

    रेणु गद्य में संगीत पैदा करते हैं और पात्रों को वास्तविक जीवन में ही जीते-जागते दिखाते हैं।

    चाँद सिंह ('शेर के बच्चे') का चरित्र क्या दर्शाता है?

    चाँद सिंह नई व्यवस्था में दक्षता और प्रदर्शन की संस्कृति को दर्शाता है जो लोक-कला को हराता है।

    इस कहानी में 'मेला' क्या प्रतीकार्थ में सूचित करता है?

    मेला सांस्कृतिक समृद्धि और लोक-परंपरा का केंद्र है जहाँ पुरानी और नई व्यवस्था का टकराव होता है।

    राजा साहब के दस रुपये देते समय 'जाओ, मेला देख कर घर जाओ' का क्या अर्थ है?

    यह संवाद पहलवानी को समाप्त मानते हुए लुन्ना को सिर्फ दर्शक बनाने की नई व्यवस्था को दर्शाता है।

    Important Board Questions

    रेणु की आंचलिक कहानियों में गाँव की भाषा और संस्कृति को महत्व देने का क्या उद्देश्य है? उदाहरण सहित स्पष्ट करें। [2 marks]

    अंचल-केंद्रित साहित्य की अवधारणा; लोकभाषा, लोकगीत, लोकनायक को केंद्र में रखना; 'पहलवान की ढोलक' में ढोलक की आवाज़ और लुन्ना का पात्र इसका उदाहरण।

    'पहलवान की ढोलक' कहानी में सामाजिक परिवर्तन (पुरानी व्यवस्था से नई व्यवस्था में आना) का लोक-कला पर क्या प्रभाव पड़ता है? कहानी के आधार पर विस्तार से समझाएं। [5 marks]

    राजा साहब की सामंती व्यवस्था का विलोप; अंग्रेजी शिक्षा और शहरीकरण का आगमन; लुन्ना की पहलवानी का क्रमशः अप्रासंगिक होना; चाँद सिंह का आना; पोल का बदलना; अंत में लुन्ना की दशा - ये सभी बिंदु संलग्न करें।

    'पहलवान की ढोलक' में ढोलक की आवाज़ ('चट्-धा, गिड्-धा') केवल एक संगीत नहीं, बल्कि गाँव की नाड़ी है। इस कथन को कहानी के प्रतीकार्थ, पात्रों के मनोविज्ञान और सामाजिक संदर्भ के आधार पर समझाइए। क्या आधुनिक भारत में ऐसी परंपराओं को बचाना संभव है? [6 marks]

    ढोलक का प्रतीकार्थ (लोक-कला, परंपरा, सांस्कृतिक पहचान); लुन्ना का मनोविज्ञान (निष्ठा, दायित्व-बोध); गाँव का संकट (भूख, महामारी); भीषण परिस्थितियों में भी जीवन जीने का साहस; मानवीय मूल्य बनाम आर्थिक व्यवस्था; अंत का खुला प्रश्न - ये सभी विचार संलग्न करते हुए निबंधात्मक उत्तर दें।

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