**भारतेंदु हरिश्चंद्र (1850-1885)** आधुनिक हिंदी साहित्य के जनक माने जाते हैं। वे एक प्रतिभाशाली कवि, नाटककार, निबंधकार और यात्रा-वृत्तांत लेखक थे। उन्होंने **'निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल'** का नारा दिया, जिसका अर्थ है कि अपनी भाषा का विकास ही सभी प्रकार की उन्नति की बुनियाद है।
भारतेंदु ने अपने जीवनकाल में कई प्रमुख पत्रिकाओं का संपादन किया:
उनकी प्रमुख रचनाएँ:
भारतेंदु की रचनाओं में दिखाई देने वाले मुख्य विषय:
1. **समाज सुधार** - रूढ़ियों और अंधविश्वास के विरुद्ध
2. **राष्ट्र-प्रेम** - भारतीय संस्कृति और सभ्यता के प्रति अनुराग
3. **अंग्रेजी शासन का विरोध** - राजनीतिक चेतना
4. **स्वाधीनता की भावना** - भारतीय आत्मनिर्भरता का संदेश
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यह पाठ **'कविवचन सुधा'** पत्रिका में **14 अक्टूबर 1871 को** प्रकाशित हुआ था। यह पत्र **भारतेंदु हरिश्चंद्र द्वारा पत्रिका के संपादक को संबोधित** करके हरिद्वार की अपनी यात्रा का विस्तृत वर्णन प्रस्तुत करता है।
**पाठ की भाषा**: इस पत्र में प्रयुक्त हिंदी लगभग 150 वर्ष पुरानी है, जो आधुनिक हिंदी के विकास का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है। इसमें संस्कृत के तत्सम शब्दों का प्रचुर प्रयोग है और शैली अत्यंत साहित्यिक व सुरुचिपूर्ण है।
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**पुण्य भूमि** - पवित्र और धार्मिक माने जाने वाली भूमि जहाँ आध्यात्मिक उन्नति संभव हो
**वल्ली** - लता, बेल या कोई भी चढ़ने वाला पौधा
**सज्जन** - सदाचारी, शिष्ट और गुणवान व्यक्ति
**मनोरथ** - मन की इच्छा, इरादा या मनचाही बात
**तपस्या** - कष्ट सहन करके आत्मिक विकास की साधना
**साधु** - धार्मिक जीवन बिताने वाला तपस्वी व्यक्ति
**निर्मल** - स्वच्छ, शुद्ध, बिना मैल के
**पवित्र** - पूजनीय, पवित्रता से परिपूर्ण, शुद्ध
**तीर्थ** - पवित्र धार्मिक स्थान जहाँ धार्मिक स्नान किया जाता है
**हरिद्वार** - उत्तराखंड में स्थित एक प्रसिद्ध तीर्थ स्थान जहाँ गंगा नदी पहाड़ों को छोड़कर मैदान में आती है
**गंगा** - भारत की सबसे पवित्र नदी, जो हिमालय से निकलकर बंगाल की खाड़ी में गिरती है
**भगीरथ** - राजा दशरथ के एक प्रसिद्ध पूर्वज जो अपनी तपस्या से गंगा को पृथ्वी पर लाए थे; इसलिए गंगा का एक नाम 'भागीरथी' भी है
**चंडिका** - देवी दुर्गा का एक रूप
**भागवत** - 18 पुराणों में से एक प्रसिद्ध पुराण जिसमें मुख्य रूप से श्रीकृष्ण की कथाएँ हैं
**दालचीनी** - दक्षिण भारत में पाया जाने वाला एक पेड़ जिसकी सुगंधित छाल मसाले और औषधि के रूप में प्रयोग होती है; इसे दारचीनी भी कहते हैं
**कल्लोल** - शोर मचाना, कलरव करना, किलकारी मारना
**कनखल** - हरिद्वार के पास स्थित एक तीर्थ स्थान जहाँ सती ने अपने शरीर को त्याग दिया था
**वैराग्य** - सांसारिक वस्तुओं के प्रति आसक्ति का त्याग
**भक्ति** - ईश्वर के प्रति निष्ठा और प्रेम भाव
**संतोष** - किसी भी परिस्थिति में संतुष्ट रहने की प्रवृत्ति
**स्थानदान** - किसी पत्र या लेख को पत्रिका में प्रकाशित करने के लिए स्थान देना
**जल-जंतु** - पानी में रहने वाले जीव-जंतु
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यह पत्र तीन मुख्य भागों में विभाजित है:
**1. प्रारंभिक भाग - संबोधन और आमुख**
लेखक पत्र की शुरुआत **'श्रीमान् कविवचन सुधा संपादक महामहिम मित्रवरेषु'** से करते हैं। यह एक पारंपरिक पत्र संबोधन है जो संपादक को सम्मानपूर्वक बताता है। फिर लेखक अपनी खुशी प्रकट करते हैं कि वे हरिद्वार का समाचार लिखने जा रहे हैं।
**2. मध्य भाग - हरिद्वार का विस्तृत वर्णन**
यह पाठ का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण भाग है जिसमें लेखक ने हरिद्वार के:
का वर्णन किया है।
**3. समापन भाग - उपसंहार और हस्ताक्षर**
लेखक पत्र को समाप्त करते हुए कहते हैं कि वे मानसिक रूप से अभी भी हरिद्वार में ही हैं। वे पत्र प्रकाशित करने का निवेदन करते हैं और **'आपका मित्र - यात्री'** के रूप में पत्र पर हस्ताक्षर करते हैं।
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**"यह भूमि तीन ओर सुंदर हरे-हरे पर्वतों से घिरी है..."**
लेखक हरिद्वार के भौगोलिक सौंदर्य का चित्रण करते हैं। पर्वतों पर विभिन्न प्रकार की लताएँ और वृक्ष हैं जो प्रकृति की सुंदरता को बढ़ाते हैं। पर्वतों पर हरियाली इतनी अधिक है कि मानो हरे-हरे गलीचे बिछे हुए हों।
**"बड़े-बड़े वृक्ष भी ऐसे खड़े हैं मानो एक पैर से खड़े तपस्या करते हैं..."**
लेखक ने वृक्षों की तुलना साधुओं से की है। जिस प्रकार साधु सभी मौसमों को सहन करते हुए तपस्या करते हैं, उसी प्रकार वृक्ष गर्मी, ओस और वर्षा को सहते हैं और मानवता की सेवा करते हैं।
**महत्वपूर्ण भाव**: वृक्षों का जीवन परोपकार का जीवन है। वे अपने फल, फूल, छाया, छाल, लकड़ी और जड़ सब कुछ मानवता को दान करते हैं, भले ही लोग उन्हें पत्थर मारें।
**"एक ओर त्रिभुवन पावनी श्री गंगा जी की पवित्र धारा बहती है..."**
गंगा नदी को **'त्रिभुवन पावनी'** (तीनों लोकों को पवित्र करने वाली) कहा गया है। लेखक गंगा की तुलना राजा भगीरथ की कीर्ति से करते हैं - जिस प्रकार भगीरथ की कीर्ति उनके कार्यों से फैलती है, उसी प्रकार गंगा की पवित्र धारा बहती है।
**गंगा के जल की विशेषताएँ**:
1. **शीतलता** - जल बहुत ठंडा है
2. **मिठास** - जल में एक विशेष मिठास है (मानो शक्कर को बर्फ में जमाया हो)
3. **स्वच्छता** - जल स्वच्छ और सफेद दिखाई देता है
4. **जीवंतता** - इसमें अनेक प्रकार के जल-जंतु हैं
**"यहाँ श्री गंगा जी दो धारा हो गई हैं - एक का नाम नील धारा, दूसरी श्री गंगा जी ही के नाम से..."**
लेखक हरिद्वार में गंगा के विभाजन का वर्णन करते हैं। नील धारा के किनारे एक छोटा पर्वत है जिसके शिखर पर चंडिका देवी की मूर्ति स्थापित है। **हरि की पैड़ी** (हरि का घाट) यहाँ का सबसे प्रसिद्ध घाट है जहाँ पर लोग स्नान करते हैं।
**"विशेष आश्चर्य का विषय यह है कि यहाँ केवल गंगा जी ही देवता हैं, दूसरा देवता नहीं।"**
यह एक अनोखी बात है कि हरिद्वार में गंगा को ही मुख्य देवता माना जाता है, न कि किसी अन्य मूर्ति को। यद्यपि वैरागियों ने कई मठ और मंदिर बना दिए हैं, लेकिन गंगा ही यहाँ का केंद्रीय धार्मिक केंद्र है।
लेखक इस क्षेत्र के पाँच मुख्य तीर्थों का उल्लेख करते हैं:
1. **हरिद्वार** - हरि की पैड़ी पर गंगा स्नान
2. **कुशावर्त** - हरिद्वार के पास ही स्थित
3. **नील धारा** - गंगा की दूसरी धारा
4. **विल्व पर्वत** - पास ही एक सुहावना पर्वत जिस पर विल्वेश्वर महादेव की मूर्ति है
5. **कनखल** - यह बहुत प्राचीन और महत्वपूर्ण तीर्थ है
**कनखल का ऐतिहासिक महत्व**: पौराणिक कथा के अनुसार, **दक्ष प्रजापति ने यहाँ एक यज्ञ किया था**। जब शिव का अपमान हुआ, तो **सती ने इसी स्थान पर अपने शरीर को त्याग दिया** (भस्म कर दिया)। इसी कारण यह स्थान बहुत पवित्र माना जाता है।
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**"पंडे भी यहाँ बड़े विलक्षण संतोषी हैं। एक पैसे को लाख करके मान लेते हैं।"**
लेखक का कहना है कि हरिद्वार के पंडे (पुजारी) असाधारण रूप से संतोषी होते हैं। वे अपनी आजीविका के लिए बहुत कम दान या भेंट में संतुष्ट रहते हैं। यह भाव दर्शाता है कि ये पंडे पैसे के लालच में नहीं, बल्कि सेवा की भावना से धर्मकार्य करते हैं।
**महत्वपूर्ण बिंदु**: यह टिप्पणी आधुनिक समय में बहुत प्रासंगिक हो जाती है जब हम देखते हैं कि धार्मिक स्थानों पर अक्सर दान और भेंट को लेकर विवाद होता है।
**"भारामल जैकृष्णदास खत्री यहाँ के प्रसिद्ध धनिक हैं।"**
लेखक हरिद्वार के एक प्रसिद्ध धनी व्यक्ति का उल्लेख करते हैं जो संभवतः धार्मिक कार्यों में दान देते होंगे।
**"यह ऐसा निर्मल तीर्थ है कि इच्छा क्रोध की खानि जो मनुष्य हैं सो वहाँ रहते ही नहीं।"**
लेखक कहते हैं कि हरिद्वार इतना पवित्र है कि जो लोग लोभ और क्रोध से युक्त हैं, वे वहाँ रहना पसंद नहीं करते। इसका अर्थ यह है कि यह स्थान सज्जन, संतोषी और आध्यात्मिक प्रवृत्ति के लोगों को आकर्षित करता है।
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**"मेरा तो चित्त वहाँ जाते ही ऐसा प्रसन्न और निर्मल हुआ कि वर्णन के बाहर है।"**
यह वाक्य लेखक की आंतरिक अवस्था को दर्शाता है। हरिद्वार पहुँचते ही उनका मन पूरी तरह प्रसन्न और शुद्ध हो गया। इस भाव को शब्दों में व्यक्त करना संभव नहीं है।
**"मैं दीवान कृपा राम के घर के ऊपर के बंगले पर टिका था। यह स्थान भी उस क्षेत्र में टिकने योग्य ही है।"**
लेखक बताते हैं कि वे एक दीवान के घर पर रुके थे। वह स्थान विशेष सुविधाजनक था क्योंकि वहाँ से सभी ओर से ठंडी हवा आती थी। यह स्थान इस क्षेत्र में रहने के लिए बिल्कुल उपयुक्त था।
**"यहाँ रात्रि को ग्रहण हुआ और हम लोगों ने ग्रहण में बड़े आनंदपूर्वक स्नान किया और दिन में श्री भागवत का पारायण भी किया।"**
हिंदू धर्म में चंद्र ग्रहण या सूर्य ग्रहण के समय गंगा में स्नान करना बहुत पवित्र माना जाता है। लेखक ने इस पवित्र अवसर पर स्नान किया और साथ ही भागवत (एक धार्मिक ग्रंथ) का पाठ भी किया।
**"वैसे ही मेरे संग कल्लू जी मित्र भी परमानंदी थे।"**
लेखक के साथ उनका मित्र कल्लू भी था जो इस यात्रा में अत्यंत आनंदित था। साथ में सुखद यात्रा और मित्रता का भाव इस पाठ को और भी सुंदर बनाता है।
**"एक दिन मैंने श्री गंगा जी के तट पर रसोई करके पत्थर ही पर जल के अत्यंत निकट परोसकर भोजन किया।"**
यह प्रसंग लेखक की सादगी और प्रकृति से जुड़ाव को दर्शाता है। वे गंगा के पवित्र जल के पास एक पत्थर पर ही भोजन करने में परमानंद की अनुभूति करते हैं।
**"जल के छलकें पास ही ठंडे-ठंडे आते थे।"**
गंगा का जल इतना शीतल और मनोहारी था कि उसके छींटे लेखक के पास आ रहे थे।
**"उस समय के पत्थर पर का भोजन का सुख सोने की थाल के भोजन से कहीं बढ़ के था।"**
यह महत्वपूर्ण कथन दर्शाता है कि सच्चा सुख भौतिक सुविधाओं में नहीं, बल्कि मन की संतुष्टि और आध्यात्मिक शांति में है। प्रकृति के बीच, पवित्र स्थान पर सादा भोजन करना सोने की थाली में किया गया भोजन से कहीं अधिक सुखद है।
**"चित्त में बारंबार ज्ञान, वैराग्य और भक्ति का उदय होता था। झगड़े-लड़ाई का कहीं नाम भी नहीं था।"**
हरिद्वार की पवित्र वायु ने लेखक के चित्त को रूपांतरित कर दिया। उन्हें ज्ञान (आत्मज्ञान), वैराग्य (सांसारिकता से विमुखता) और भक्ति (ईश्वर भक्ति) की अनुभूति होती थी। और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस पवित्र स्थान पर कोई विवाद या झगड़ा नहीं दिखाई देता।
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**"यहाँ का जनेऊ अच्छा महीन और उज्ज्वल बनता है।"**
हरिद्वार में बनने वाले जनेऊ (यज्ञोपवीत - ब्राह्मणों द्वारा पहना जाने वाला पवित्र धागा) बहुत महीन और सुंदर होते हैं। यह हरिद्वार की विशेष कला और उत्पाद है।
**"यहाँ की कुशा सबसे विलक्षण होती है जिसमें से दालचीनी, जावित्री इत्यादि की अच्छी सुगंध आती है।"**
हरिद्वार में उगने वाली कुशा (एक प्रकार की पवित्र घास) असाधारण सुगंधित होती है। इसमें दालचीनी और जावित्री (जायफल) जैसी सुगंध आती है। यह प्राकृतिक सुगंध हरिद्वार की पवित्रता का प्रमाण है।
**"मानो यह प्रत्यक्ष प्रगट होता है कि यह ऐसी पुण्य भूमि है कि यहाँ की घास भी ऐसी सुगंधमय है।"**
लेखक इससे निष्कर्ष निकालते हैं कि अगर यहाँ की साधारण घास भी इतनी सुगंधित है, तो स्पष्ट है कि यह भूमि वाकई पवित्र और पुण्यशाली है।
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**"अहा! इनके जन्म भी धन्य हैं जिनसे अर्थी विमुख जाते ही नहीं। फल, फूल, गंध, छाया, पत्ते, छाल, बीज, लकड़ी और जड़; यहाँ तक कि जले पर भी कोयले और राख से लोगों का मनोर्थ पूर्ण करते हैं।"**
यह पंक्ति वृक्षों के महत्व को समझाने वाली सबसे व्यापक व्याख्या है। लेखक कहते हैं:
1. **वृक्षों का जीवन धन्य है** - क्योंकि वे अपने जीवनकाल में मनुष्यों की सेवा करते हैं
2. **वृक्षों के सभी भाग उपयोगी हैं**:
3. **लोग वृक्षों को पत्थर भी मारते हैं**, फिर भी वे फल देते रहते हैं - यह सज्जनता की सर्वश्रेष्ठ परिभाषा है
**"सज्जन ऐसे कि पत्थर मारने से फल देते हैं।"**
यह उक्ति परोपकार का सर्वोच्च रूप है। वृक्ष भले ही पत्थर मारे जाएँ, फिर भी अ
Q1. भारतेंदु हरिश्चंद्र ने कविवचन सुधा पत्रिका में हरिद्वार यात्रा का वर्णन किस रूप में प्रस्तुत किया?
Answer: A — पाठ की शुरुआत में ही लेखक 'कविवचन सुधा संपादक महामहिम मित्रवरेषु' को संबोधित करते हुए पत्र लिखते हैं।
Q2. लेखक के अनुसार हरिद्वार की पवित्रता का सबसे बड़ा प्रमाण क्या है?
Answer: B — पाठ के शुरुआत में लेखक कहते हैं: 'यह भूमि ऐसी है कि प्रवेश करने ही से मन शुद्ध हो जाता है।'
Q3. पर्वतों पर फैली लताओं का लेखक किससे तुलना करते हैं?
Answer: B — लेखक लिखते हैं कि पर्वतों पर लताएँ 'सज्जनों के शुभ मनोरथों की भाँति फैलकर लहलहा रही हैं।'
Q4. लेखक के अनुसार वृक्षों की तपस्या किससे संबंधित है?
Answer: B — लेखक कहते हैं कि वृक्ष साधुओं की तरह गर्मी, ओस और वर्षा सभी को अपने ऊपर सहते हैं।
Q5. हरिद्वार में गंगा की कौन-सी विशेषता अद्भुत है?
Answer: B — लेखक विस्तार से बताते हैं कि हरिद्वार में गंगा दो धारों में विभक्त हो जाती है — एक नील धारा, दूसरी गंगा।
Q6. लेखक ने 'पत्थर पर का भोजन सोने की थाली से बढ़कर' क्यों बताया?
Answer: B — यह वाक्य यह दर्शाता है कि संतुष्टि, सादगी और आध्यात्मिक अनुभव भौतिक सुखों से अधिक मूल्यवान हैं।
Q7. 'वैराग्य और भक्ति का उदय' लेखक को किस अनुभव से हुआ?
Answer: C — लेखक कहते हैं कि इस पवित्र स्थान पर, जहाँ झगड़े-लड़ाई का कहीं नाम नहीं था, उनके मन में वैराग्य और भक्ति का उदय हुआ।
Q8. हरिद्वार को 'निर्मल तीर्थ' कहने का कारण क्या है?
Answer: B — लेखक स्पष्ट कहते हैं कि यह ऐसा निर्मल तीर्थ है कि इच्छा-क्रोध वाले मनुष्य यहाँ रहते ही नहीं।
Q9. लेखक द्वारा यहाँ की कुशा के बारे में क्या कहा गया है, जो भारतीय संस्कृति से जुड़ा है?
Answer: B — लेखक कहते हैं कि यहाँ की कुशा विलक्षण सुगंध से युक्त है, जो पुण्यभूमि की पवित्रता को दर्शाती है और यज्ञ-संस्कार में भी काम आती है।
Q10. पत्र के अंत में 'स्थानदान' माँगने का क्या अर्थ है?
Answer: B — 'स्थानदान' का अर्थ है पत्र को पत्रिका में प्रकाशित करने के लिए स्थान देना, अर्थात इसे महत्व देकर छापना और पाठकों तक पहुँचाना।
भारतेंदु हरिश्चंद्र कौन थे?
भारतेंदु हरिश्चंद्र आधुनिक हिंदी साहित्य के जनक माने जाते हैं, जिन्होंने 'निज भाषा उन्नति अहै' का नारा दिया और कविता, नाटक, निबंध और यात्रा-वृत्तांत लिखे।
हरिद्वार किस राज्य में है?
हरिद्वार भारत के उत्तरखंड राज्य में स्थित है, जहाँ गंगा पहाड़ों को छोड़कर मैदान में आती है।
'हरि की पैड़ी' का क्या अर्थ है?
हरि की पैड़ी हरिद्वार में गंगा के किनारे बना एक प्रसिद्ध पक्का घाट है जहाँ श्रद्धालु स्नान करते हैं।
हरिद्वार के पाँच मुख्य तीर्थ कौन-कौन से हैं?
हरिद्वार के पाँच मुख्य तीर्थ हैं — हरिद्वार, कुशावर्त्त, नीलधारा, विल्वपर्वत और कनखल।
लेखक के अनुसार गंगा का जल कैसा है?
लेखक के अनुसार गंगा का जल अत्यंत शीतल और मीठा है, जैसे चीनी के पनीले को बर्फ में जमा दिया हो।
वृक्षों के बारे में लेखक क्या कहता है?
लेखक कहता है कि बड़े-बड़े वृक्ष साधुओं की तरह तपस्या करते हैं और हर मौसम की गर्मी, ओस और वर्षा सहते हैं।
लेखक ने गंगा के तट पर भोजन करके क्या कहा?
लेखक ने कहा कि पत्थर पर किया गया भोजन सोने की थाली पर किए गए भोजन से कहीं अधिक सुखद था।
पत्र की भाषा का मुख्य लक्षण क्या है?
इस पत्र की भाषा का मुख्य लक्षण सरलता और चित्रात्मकता है, जो लगभग 150 वर्ष पुरानी हिंदी को दर्शाती है।
लेखक को हरिद्वार में कौन-सा अनुभव हुआ?
लेखक को हरिद्वार में आध्यात्मिक अनुभव हुआ — उनके मन में ज्ञान, वैराग्य और भक्ति का उदय हुआ।
यहाँ की कुशा की विशेषता क्या है?
यहाँ की कुशा सबसे विलक्षण है, जिससे दालचीनी और जावित्री जैसी सुगंधें आती हैं, जो पुण्यभूमि की पवित्रता दर्शाती है।
हरिद्वार को 'पुण्यभूमि' कहने का क्या कारण है? [1 mark]
मन की शुद्धता, प्रकृति की पवित्रता — एक जवाब लिखो।
लेखक के अनुसार वृक्षों की तुलना किससे की गई है और क्यों? [2 marks]
साधुओं से — तपस्या और सहनशीलता का कारण बताओ।
हरिद्वार के पाँच मुख्य तीर्थ कौन-कौन से हैं? इनमें से किसी एक के बारे में दो वाक्य लिखो। [3 marks]
पाँच नाम: हरिद्वार, कुशावर्त्त, नीलधारा, विल्वपर्वत, कनखल — कनखल में सती की कथा है।
लेखक ने 'पत्थर पर का भोजन सोने की थाली से बढ़कर' कहकर कौन-सा जीवन-मूल्य प्रस्तुत किया है? इस अनुभव से हमें क्या शिक्षा मिलती है? [5 marks]
संतुष्टि, सादगी, प्रकृति से जुड़ाव — भारतीय जीवन-दर्शन में सच्चा सुख कहाँ है, इसे समझाओ।
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