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**जन्म और जीवन परिचय**
कृश्नचंद्र का जन्म सन् 1914 में पंजाब के वशीराबाद गाँव (हिमाचल प्रदेश) में हुआ था। उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा पंच (जम्मू और कश्मीर) में ग्रहण की। उच्च शिक्षा के लिए वे सन् 1930 में लाहौर आए और फॉर्मेन क्रिश्चियन कॉलेज में प्रवेश लिया। सन् 1934 में उन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में एम.ए. की पढ़ाई पूरी की। बाद में उनका संबंध फिल्म जगत से जुड़ा और अंतिम समय तक वे मुंबई में रहे। सन् 1977 को उनका निधन हुआ।
**साहित्यिक योगदान**
कृश्नचंद्र प्रेमचंद के बाद हिंदी-उर्दू कथा साहित्य को नई ऊंचाइयों तक ले गए। वे प्रगतिशील लेखक संघ से गहराई से जुड़े थे, जिसका प्रभाव उनकी रचनाओं में स्पष्ट दिखाई देता है। हालांकि कृश्नचंद्र ने उपन्यास, नाटक, रिपोर्ताज और निबंध भी लिखे, पर उनकी पहचान मुख्यतः एक कहानीकार के रूप में हुई।
**प्रमुख कृतियाँ**
**साहित्यिक विशेषताएं**
कृश्नचंद्र की पहचान कवि-सुलभ रोमांटिक शैली और विविध शैली के कारण अलग मुकाम बनाती है। वे प्रगतिशील और यथार्थवादी दृष्टिकोण से लिखते थे। उर्दू-हिंदी कथा साहित्य में उनकी अनूठी रचनाशीलता के लिए वे बहुचर्चित रहे।
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**शीर्षक का महत्त्व**
'जामुन का पेड़' एक विख्यात हास्य-व्यंग्य कथा है। यह एक साधारण घटना के माध्यम से सरकारी कार्यालयों की जटिल, निरर्थक और मानवविरोधी व्यवस्था को उजागर करती है। पेड़ शीर्षक में प्रतीकात्मक है — वह संकट, नौकरशाही की अव्यवस्था और मानवीय संवेदनशीलता के अभाव का प्रतीक बन जाता है।
**विधा: हास्य-व्यंग्य कहानी**
हास्य-व्यंग्य के लिए घटनाओं को अनुपात से अधिक फुलाया-पुलाया जाता है। इसलिए यहाँ यदि घटनाएं अतिश्योक्तिपूर्ण और अविश्वसनीय जान पड़ें, तो कोई हैरानी नहीं। विश्वसनीयता ऐसी रचनाओं के मूल्यांकन की कसौटी नहीं है। प्रस्तुत पाठ में हँसते-हँसते हमारे भीतर इस बात की समझ पैदा हो जाती है कि कार्यालयी तौर-तरीकों में पाया जाने वाला विस्तार कितना निरर्थक और प्रक्रिया कितनी हास्यास्पद है। साथ ही, इस व्यवस्था की संवेदनशून्य एवं अमानवीय प्रकृति का पक्ष भी हमारे सामने आता है।
**कथानक का सार**
रात को बड़े शोर का झंझावात चलता है और सरकारी सचिवालय के लॉन में जामुन का एक पेड़ गिर जाता है। सुबह जब माली पेड़ के नीचे एक दबा हुआ आदमी को पाता है, तो एक लंबी फाइल-यात्रा शुरू हो जाती है। सरकारी विभागों के बीच पत्राचार होता है, हर विभाग अपनी जिम्मेदारी नकारता है, लेकिन कोई निर्णय नहीं लिया जाता। अंत में पता चलता है कि दबा हुआ आदमी एक कवि है। सब कुछ बदल जाता है — सरकार उसे सदस्य बनाती है, लेकिन उसे पेड़ के नीचे से निकालने का कोई प्रबंध नहीं करती। विडंबना यह है कि सारी प्रक्रिया पूरी हो जाती है पर दुर्भाग्य से कवि की मृत्यु हो जाती है।
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**दबा हुआ आदमी/कवि (आशल)**
यह कहानी का केंद्रीय पात्र है। आरंभ में वह एक साधारण आदमी लगता है जो पेड़ के नीचे दबा होता है। बाद में पता चलता है कि वह एक प्रसिद्ध कवि 'आशल' है जिसकी काव्य कृति 'आशल के फूल' प्रकाशित हो चुकी है। वह शारीरिक कष्ट में होता है पर समझदारी से भरा है। उसका प्रसिद्ध शेर है:
*"ये तो माना कि तगाफुल न करोगे लेकिन खाक हो जाएँगे हम तुमको खबर होने तक"*
(मिर्ज़ा गालिब का शेर)
उसकी विडंबनापूर्ण स्थिति यह है कि सरकार उसे सम्मानित करती है पर उसके जीवन को बचाने के लिए कोई कदम नहीं उठाती।
**माली**
माली एक सरल, ईमानदार और संवेदनशील पात्र है। वह पेड़ के नीचे दबे आदमी के प्रति सहानुभूति रखता है, उसे खाना खिलाता है, उसकी खबरें पूछता है। वह सरकारी नियमों की मूर्खता को समझ सकता है लेकिन उससे कुछ कर नहीं सकता। वह मानवीय रूप से सही काम करना चाहता है परंतु व्यवस्था उसे बाधित करती है।
**क्लर्क, चपरासी, सुपरिंटेंडेंट**
ये पात्र सरकारी नौकरशाही के प्रतीक हैं। प्रत्येक अपनी जिम्मेदारी से बचना चाहता है और काम को अगले विभाग को सौंप देता है। ये पात्र यंत्रवत् काम करते हैं और मानवीय पहलू पर विचार नहीं करते।
**सचिवालय की समिति**
सचिवालय की विभिन्न समितियों के सदस्य प्रतीकात्मक तरीके से दिखाई देते हैं। वे विभिन्न कार्यालयीन दृष्टिकोण से समस्या को देखते हैं: कृषि विभाग, व्यापार विभाग, हार्टिकल्चर विभाग आदि।
**साहित्य अकादेमी का सचिव**
यह पात्र सरकारी संवेदनशीलता और साहित्य-प्रेम का प्रतिनिधित्व करता है लेकिन व्यवहारिक कार्य में असमर्थ साबित होता है। वह कवि को पुरस्कृत तो करता है पर उसके जीवन का प्रश्न हल नहीं कर पाता।
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**प्रसंग 1: पेड़ का गिरना और आदमी का मिलना**
कहानी की शुरुआत एक रात के तूफान से होती है जब सचिवालय के लॉन में जामुन का पेड़ गिर जाता है। सुबह जब माली पेड़ के नीचे एक आदमी को दबा हुआ पाता है, तो यह एक सामान्य घटना लगती है। यहाँ सहानुभूति का पहला क्षण आता है जब क्लर्क अफसोस करते हैं: "बेचारा जामुन का पेड़। कितना फलदार था!" और "और इसकी जामुनें कितनी रसीली होती थीं!" यह प्राकृतिक वस्तु पर दुःख व्यक्त करना, पर मानव जीवन पर अन्यथा दृष्टिकोण रखना विडंबना को दर्शाता है।
**यहाँ सीखें:**
**प्रसंग 2: फाइल का लंबा सफर और विभागीय उलझनें**
पेड़ को हटाने की समस्या को लेकर एक लंबी फाइल-यात्रा शुरू होती है:
फिर पीछे की ओर:
"फाइल चलती रही। इसी में आधा दिन बीत गया।"
इस प्रसंग में अतिश्योक्ति का प्रयोग है। कृश्नचंद्र दिखाते हैं कि कैसे सरकारी व्यवस्था में कोई भी निर्णय नहीं ले सकता, हर विभाग अपनी जिम्मेदारी से बचना चाहता है। पत्रों का आदान-प्रदान होता है पर दबे आदमी का कोई उपाय नहीं होता।
**यहाँ सीखें:**
**पात्रों के महत्त्वपूर्ण संवाद:**
"क्या मुश्किल है?" माली बोला, "अगर सुपरिंटेंडेंट साहब हुक्म दें, तो अभी पंद्रह-बीस माली, चपरासी और क्लर्क लगाकर पेड़ के नीचे से दबे हुए आदमी को निकाला जा सकता है।"
लेकिन एक सुस्त, कामचोर और मोटा चपरासी कहता है: "मुश्किल मालूम होता है, पेड़ का तना बहुत भारी और वशनी है।"
इससे पता चलता है कि समस्या हल करने का इच्छा नहीं, बल्कि बहाने बनाने की प्रवृत्ति है।
**प्रसंग 3: विभागीय द्वंद्व (Departmental Conflicts)**
दिन दर दिन प्रत्येक विभाग अपनी जिम्मेदारी अस्वीकार करता है:
**कृषि विभाग:** "पेड़ व्यापार विभाग के लॉन में गिरा है, इसलिए व्यापार विभाग की जिम्मेदारी है।"
**व्यापार विभाग:** "पेड़ को हटाने की जिम्मेदारी कृषि विभाग पर है क्योंकि यह एक पेड़ है, जो कृषि के अंतर्गत आता है।"
**हार्टिकल्चर विभाग:** "यह एक फलदार पेड़ का मामला है और हार्टिकल्चर विभाग अनाज और खेती-बाड़ी के मामलों में फैसला करने का हकदार है। जामुन का पेड़ हार्टिकल्चर विभाग के अंतर्गत आता है।"
यह व्यंग्य दिखाता है कि नियम-कानून इतने जटिल हो गए हैं कि कोई भी सरल काम करना मुश्किल हो जाता है।
**यहाँ सीखें:**
**प्रसंग 4: चिकित्सा और सर्जरी की संभावनाएं (अतिश्योक्तिपूर्ण हास्य)**
कुछ लोग सुझाव देते हैं कि आदमी को ही काट कर निकाल लिया जाए। एक सुझाव:
"अगर इस आदमी को बीच में से, यानी धड़ से काटा जाए तो आधा आदमी इधर से निकल आएगा, आधा आदमी उधर से बाहर आ जाएगा और पेड़ वहीं का वहीं रहेगा।"
लेकिन दबा हुआ आदमी आपत्ति करता है: "लेकिन इस तरह तो मैं मर जाऊँगा।"
एक क्लर्क: "यह भी ठीक कहता है।"
फिर एक और सुझाव आता है कि प्लास्टिक सर्जरी से आदमी को सिलवा दिया जाए। इस अतिश्योक्तिपूर्ण हास्य के माध्यम से कृश्नचंद्र दिखाते हैं कि नौकरशाही कितनी बेतुकी सलाहें दे सकती है। मानव जीवन की कितनी कम कद्र है।
**यहाँ सीखें:**
**प्रसंग 5: पता चलना कि आदमी एक कवि है**
दूसरे दिन माली और अन्य कर्मचारी सुनते हैं कि दबा हुआ आदमी 'शायर' है। यह खबर सचिवालय में आग की तरह फैल जाती है। लोग उसे देखने के लिए भीड़ लगा जाते हैं। गलियों से शायरों का तांता बंध जाता है। सचिवालय का लॉन काव्य-सम्मेलन का स्थान बन जाता है।
सचिवालय की समिति तय करती है कि चूँकि दबा हुआ आदमी एक कवि है, इसलिए यह मामला कृषि, व्यापार या हार्टिकल्चर विभाग से संबंधित नहीं है, बल्कि सांस्कृतिक विभाग (Cultural Department) से संबंधित है। साहित्य अकादेमी से अनुरोध किया जाता है कि जल्दी से जल्दी मामले का फैसला करके भागे कवि को इस पेड़ के नीचे से छुटकारा दिलाया जाए।
यहाँ विडंबना यह है कि सरकार अपनी कलात्मक समझ को दिखाती है लेकिन मानवीय कल्याण को भूल जाती है।
**साहित्य अकादेमी का सचिव का संवाद:**
"क्या तुम वही 'आशल' हो, जिसका गद्य-संग्रह 'आशल के फूल' अभी हाल ही में प्रकाशित हुआ है?"
"जी हाँ।"
"क्या तुम हमारी अकादेमी के सदस्य हो?"
"नहीं।"
"आश्चर्य है! इतना बड़ा कवि... 'आशल के फूल' का लेखक और हमारी अकादेमी का सदस्य नहीं है। उफ! कैसी भूल हो गई हमसे। कितना बड़ा कवि और कैसी अँधेरी गुमनामी में दबा पड़ा है।"
**महत्त्व:**
**प्रसंग 6: अंतर्राष्ट्रीय जटिलता (Diplomatic Complication)**
अब समस्या एक अंतर्राष्ट्रीय मामला बन जाता है। पता चलता है कि जामुन का पेड़ दस साल पहले पीटोनिया (Peithonia) राज्य के प्रधानमंत्री ने सचिवालय के लॉन में लगवाया था। अगर यह पेड़ काट दिया गया, तो पीटोनिया सरकार से भारत के संबंध बिगड़ सकते हैं।
एक क्लर्क: "लेकिन एक आदमी की जान का सवाल है।"
दूसरा क्लर्क: "दूसरी ओर दो राज्यों के संबंधों का सवाल है। और यह भी तो समझो कि पीटोनिया सरकार हमारे राज्य को कितनी सहायता देती है— क्या हम उनकी मैत्रता की खातिर एक आदमी के जीवन का ही बलिदान नहीं दे सकते?"
एक क्लर्क: "कवि को मर जाना चाहिए।"
दूसरा क्लर्क: "निःसंदेह।"
**विडंबना और व्यंग्य:**
यह प्रसंग राजनीति और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के नाम पर मानवीय मूल्य को कुर्बान करने की हकीकत को दिखाता है। अंतर्राष्ट्रीय चिंताएं राष्ट्रीय प्रक्रिया को नियंत्रित करती हैं, और मानव जीवन निरर्थक हो जाता है।
**यहाँ सीखें:**
**प्रसंग 7: विदेश विभाग का आदेश और पेड़ को काटने पर प्रतिबंध**
दूसरे दिन जब वन विभाग (Forest Department) के लोग आरी-कुल्हाड़ी लेकर पहुँचते हैं, तो उन्हें विदेश विभाग का आदेश मिल जाता है कि इस पेड़ को नहीं काटा जाए। सुपरिंटेंडेंट खुशी से चिल्लाता है:
"सुनते हो! प्रधानमंत्री ने इस पेड़ को काटने का हुक्म दे दिया, और इस घटना की सारी अंतर्राष्ट्रीय जिम्मेदारी अपने सिर ले ली है। कल यह पेड़ काट दिया जाएगा, और तुम इस संकट से छुटकारा हासिल कर लोगे।"
लेकिन दबा हुआ कवि का हाथ ठंडा था, आँखों की पुतलियाँ निर्जीव थीं, और चींटियों की एक लंबी पाँत उसके मुँह में जा रही थी। उसके जीवन की फाइल भी पूर्ण हो चुकी थी।
**अंत की विडंबना:**
शीर्ष सत्ता का निर्णय तो हो गया, लेकिन बहुत देर हो गई। मानवीय जीवन प्रशासनिक प्रक्रिया की गति से नहीं बल्कि प्राकृतिक नियमों की गति से चलता है। सरकार ने कवि को पुरस्कार तो दे दिया, सदस्य भी बना दिया, पर उसका जीवन बचा नहीं सकी।
**यहाँ सीखें:**
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**कहानी का मुख्य संदेश**
'जामुन का पेड़' केवल एक हास्य-व्यंग्य कहानी नहीं है। इसमें गहरी सामाजिक आलोचना निहित है। कृश्नचंद्र कई महत्त्वपूर्ण विषयों पर व्यंग्य करते हैं:
**1. नौकरशाही की विफलता**
भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर कृश्नचंद्र की समीक्षा कठोर है। फाइलों का लंबा सफर, विभागों के बीच पत्राचार, और अंत में कोई निर्णय न होना— ये सब नौकरशाही की विफलता को दर्शाते हैं। हर क्लर्क, हर अफसर अपनी जिम्मेदारी से बचना चाहता है। जब तक निर्णय होता है, तब तक मानवीय जीवन समाप्त हो जाता है।
**2. प्रक्रिया बनाम परिणाम**
सरकारी तंत्र में प्रक्रिया (Process) महत्त्वपूर्ण है, परिणाम (Outcome) नहीं। हजारों आदेश, पत्र, फाइलें— सब कुछ होता है पर मानवीय समस्या हल नहीं होती। कवि के संदर्भ में भी यही बात दिखाई देती है। सरकार उसे सदस्य बनाती है, पुरस्कृत करती है, पर उसकी जान का सवाल तक नहीं उठाती।
**3. संवेदनशीलता का अभाव**
कहानी में बार-बार दिखाया गया है कि व्यवस्था मानवीय संवेदनशीलता से वंचित है। क्लर्क पेड़ की जामुनों पर दुःख व्यक्त करते हैं, पर दबे हुए आदमी के दर्द पर कोई प्
Q1. कृश्नचंद्र का जन्म किस वर्ष और किस प्रांत में हुआ था?
Answer: A — कृश्नचंद्र का जन्म सन् 1914 में पंजाब के वशीराबाद गाँव में हुआ था।
Q2. 'जामुन का पेड़' कहानी में मुख्य समस्या का समाधान क्यों नहीं होता?
Answer: B — व्यापार विभाग, कृषि विभाग और हार्टीकल्चर विभाग एक-दूसरे को जिम्मेदारी देते हैं, जिससे कोई अंतिम निर्णय नहीं हो पाता।
Q3. इस कहानी में हास्य-व्यंग्य की प्रमुख तकनीक कौन सी है?
Answer: B — कहानी में अतिशयोक्ति का उपयोग करके प्रशासनिक व्यवस्था की निरर्थकता को हास्य के माध्यम से व्यंग्य में बदला गया है।
Q4. हार्टीकल्चर विभाग के सचिव का पत्र किस बात से विचारवान दिखता है?
Answer: B — हार्टीकल्चर विभाग का सचिव साहित्य-प्रेमी है और व्यंग्य के साथ कहता है कि 'पेड़ लगाओ' योजना चलाते समय फलदार पेड़ को काटना विरोधाभास है।
Q5. निम्नलिखित में से कौन सा कथन गलत है? (A) कृश्नचंद्र प्रगतिशील लेखकों का हिस्सा थे (B) 'जामुन का पेड़' केवल एक मजेदार कहानी है (C) कहानी में नौकरशाही की असंवेदनशीलता दिखाई देती है (D) पेड़ के नीचे दबा आदमी अंत तक दबा रहता है
Answer: B — (B) गलत है क्योंकि 'जामुन का पेड़' केवल मजेदार कहानी नहीं है बल्कि व्यंग्य के माध्यम से प्रशासनिक व्यवस्था की आलोचना करती है।
Q6. अगर सुपरिंटेंडेंट के पास स्वयं निर्णय लेने की शक्ति होती, तो क्या होता?
Answer: D — यह प्रश्न बताता है कि कहानी की असली समस्या अधिकारियों की असहायता और निर्णय क्षमता की कमी है, न कि समस्या की जटिलता।
Q7. माली द्वारा दबे आदमी को दाल-भात खिलाने का क्या मतलब है?
Answer: B — माली का यह कार्य संकेत करता है कि वह जानता है प्रशासनिक प्रक्रिया में समय लगेगा इसलिए आदमी को भूखे रहने से बचाता है।
Q8. प्लास्टिक सर्जरी वाली बातचीत (आदमी को बीच से काटकर जोड़ना) में क्या व्यंग्य है?
Answer: B — प्लास्टिक सर्जरी का सुझाव दिखाता है कि नौकरशाही कितनी बेतुकी चीजों पर भी विचार करती है बजाय सीधे समाधान के।
Q9. निम्न में से किस विभाग ने सबसे अंत में सही निर्णय लिया?
Answer: D — कहानी के अंत में मेडिकल विभाग ने अपना सबसे योग्य प्लास्टिक सर्जन भेजने का निर्देश दिया, जो दिखाता है कि अंत में कहानी का संदर्भ अस्पष्ट और व्यंग्यात्मक रहता है।
Q10. कृश्नचंद्र की कहानीकला की मुख्य विशेषता कौन सी है जो 'जामुन का पेड़' में दिखती है?
Answer: B — कृश्नचंद्र की कहानीकला काव्यात्मक रोमानियत और शैली की विविधता के माध्यम से गंभीर सामाजिक आलोचना करती है, जो 'जामुन का पेड़' में स्पष्ट है।
जामुन का पेड़ कहानी का विषय किस विभाग के बीच एक समस्या बन जाता है?
व्यापार विभाग और कृषि विभाग एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालते हैं कि पेड़ किसके अधीन है।
इस कहानी में हास्य-व्यंग्य का मुख्य लक्ष्य क्या है?
नौकरशाही की असंवेदनशीलता और कार्यालयीन प्रक्रिया की निरर्थकता को उजागर करना।
कहानी की शुरुआत में पेड़ के नीचे दबे आदमी को कौन बचाने का प्रयास करता है?
माली पहले सुझाव देता है कि पंद्रह-बीस लोग मिलकर पेड़ को उठा सकते हैं।
सुपरिंटेंडेंट को क्यों फाइल आगे भेजनी पड़ी?
क्योंकि वह पेड़ को हटाने का निर्णय स्वयं नहीं ले सकता था और उसे अधिकारियों की अनुमति चाहिए।
हार्टीकल्चर विभाग की प्रतिक्रिया क्या थी?
उन्होंने कहा कि जामुन का पेड़ फलदार है इसलिए उसे काटा नहीं जा सकता।
दबे हुए आदमी ने अपनी स्थिति के बारे में माली को क्या बताया?
वह कहता है कि अगर पेड़ को बीच से काट दिया जाए तो वह आधा बाहर आ सकता है।
कृश्नचंद्र कौन थे?
प्रगतिशील लेखक जो साहित्य को जीविका का साधन बनाते थे और सामाजिक समस्याओं पर लिखते थे।
इस कहानी में अतिशयोक्ति का उपयोग क्यों किया गया?
प्रशासनिक प्रक्रिया की मूर्खता को हास्य के माध्यम से अधिक प्रभावी ढंग से दिखाने के लिए।
पुलिस कांस्टेबल को दबे आदमी की रखवाली क्यों करनी पड़ी?
ताकि लोग कानून को अपने हाथ में न लें और पेड़ को स्वयं न हटा दें।
अंत में क्या निष्कर्ष निकलता है?
कि पेड़ वहीं पड़ा रहता है और व्यवस्था कभी किसी वास्तविक समस्या का समाधान नहीं करती।
'जामुन का पेड़' कहानी में व्यंग्य क्या उद्देश्य निभाता है? उदाहरण सहित समझाइए। [2 marks]
व्यंग्य के माध्यम से नौकरशाही की असंवेदनशीलता दिखाना। उदाहरण — फाइल का चलना, विभागों का एक-दूसरे को जिम्मेदारी देना।
कहानी में दबे आदमी के लिए विभिन्न 'समाधान' (पेड़ को हटाना, आदमी को काटना, प्लास्टिक सर्जरी) क्यों प्रस्तावित किए जाते हैं? प्रशासनिक व्यवस्था के प्रति कृश्नचंद्र की आलोचना को स्पष्ट करें। [5 marks]
ये समाधान दिखाते हैं कि प्रशासन किसी वास्तविक समस्या को हल करने के बजाय कागजी कार्रवाई में फंसा रहता है। प्रत्येक समाधान की बेतुकीपन से नौकरशाही की विडंबना उजागर होती है।
'जामुन का पेड़' कहानी का अंत अधूरा क्यों रखा गया? कहानी के इस अंत से कृश्नचंद्र क्या संदेश देना चाहते हैं? भारतीय समाज के संदर्भ में व्याख्या करें। [6 marks]
अंत अधूरा है क्योंकि प्रशासनिक प्रक्रिया कभी समाप्त नहीं होती। संदेश — व्यवस्था मानवीय समस्याओं की परवाह नहीं करती, केवल कागज चलते रहते हैं। भारतीय समाज में सरकारी तंत्र की यही वास्तविकता है जो नागरिकों को परेशान करती है।
Q1. Assertion (A):
जामुन का पेड़ कहानी में अतिशयोक्ति का प्रयोग हास्य-व्यंग्य को बढ़ाने के लिए किया गया है।
Reason (R):
अतिशयोक्ति के माध्यम से सरकारी कार्यालयी व्यवस्था की जटिलता, लालफिताइशम और निरर्थकता को उजागर किया जाता है।
Answer: A — Both A and R are true, and R is the correct explanation of A — दोनों कथन सत्य हैं और कारण कथन को पूरी तरह से समझाता है। कहानी में अतिशयोक्ति का प्रयोग सरकारी व्यवस्था की व्यर्थता को व्यंग्यात्मक तरीके से प्रस्तुत करने के लिए किया गया है।
Q2. Assertion (A):
कृष्णचंदर प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े थे।
Reason (R):
उनकी रचनाओं में प्रगतिशील और यथार्थवादी दृष्टिकोण स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
Answer: A — Both A and R are true, and R is the correct explanation of A — दोनों कथन सत्य हैं। पाठ में कहा गया है कि कृष्णचंदर का प्रगतिशील लेखक संघ से गहरा संबंध था और यह असर उनकी रचनाओं में स्पष्ट रूप से झलकता है।
Q3. Assertion (A):
माली की सहानुभूति दिखाना कहानी का एक महत्वपूर्ण भाग है।
Reason (R):
माली की सहानुभूति से यह संदेश मिलता है कि साधारण जन अभी भी मानवीय मूल्यों को समझता है।
Answer: A — Both A and R are true, and R is the correct explanation of A — दोनों कथन सत्य हैं और कारण पूरी तरह से कथन को समर्थन देता है। माली बंद आदमी को खाना खिलाता है और उसके परिवार के बारे में पूछता है, जो सरकारी तंत्र की विफलता के विरुद्ध एक सकारात्मक संदेश है।
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Case Study:
रात को बड़े शोर का झंझट चला। सेक्रेटेरिएट के लॉन में जामुन का एक पेड़ गिर पड़ा। सोझे को जब माली ने देखा, तो उसे पता चला कि पेड़ के नीचे एक आदमी दबा पड़ा है। माली दौड़ा-दौड़ा चपरासी के पास गया, चपरासी दौड़ा-दौड़ा क्लर्क के पास गया, क्लर्क दौड़ा-दौड़ा सुपरिंटेंडेंट के पास गया। मिनटों में गिरे हुए पेड़ के नीचे दबे हुए आदमी के चारों ओर भीड़ इकट्ठी हो गई।
Q1. इस अंश में पदानुक्रम (hierarchy) का चित्रण किस माध्यम से किया गया है?
Answer: B
Q2. इस घटना से सरकारी तंत्र के बारे में क्या संकेत मिलता है?
Answer: B
Q3. माली की तुरंत प्रतिक्रिया दिखाती है कि -
Answer: D
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